अकल बड़ी या भैंस
लेखक परिचय:-
अमृत लाल नागर जी का जन्म (17 अगस्त 1916 -23 फरवरी 1990) की हुआ था। हिंदी साहित्य के मूर्धन्य साहित्यकार, उपन्यासकार और कहानीकार थे, जिन्हें प्रेमचंद का उत्तराधिकारी माना जाता है। लखनऊ को केंद्र बना कर उन्होंने ‘ बूंद और समुद्र ‘, ‘ मानस का हंस ‘ , और ‘ खंजन नयन ‘ नम्र रचनाएं लिखी है। उन्हें 1981 में पद्मभूषण समा से सम्मानित किया गया था।
जंगल में एक बहुत बड़ा तालाब था। जंगल के सभी जानवर इसी तालाब का पानी पीने आते थे। तालाब के किनारे एक पुराना पेड़ था। उसपर एक अक्लमंद बंदर रहता था। उसको सब अकलू कहकर पुकारते थे।
गरमी की दोपहर थी एक भैंस तालाब में घुसकर नहाने लगी। बड़ी देर के बाद जब वह तालाब से बाहर निकली, तब उसके बड़े से शरीर पर कीचड़ लगा हुआ था। अकलू ने उसे देखा, तो ज़ोर से खी-खी करके हँसने लगा। भैंस बिगड़ गई। गुस्से से बोली, “तुझे शर्म नहीं आती, अपने से बड़ों पर हँसते हुए?”
बंदर और ज़ोर से हँसा, और बोला, “अरे, तो ऐसा भी क्या नहाना कि देह पर कीचड़-मिट्टी लगी रहे। इससे अच्छा तो यही था कि नहाने ही न जाती। तूने तालाब का पानी भी गंदा कर दिया और खुद भी गंदी ही रही। ऐसे नहाने का क्या फायदा?” “जा, जा। बड़ा आया,” भैंस ने धमकाया, “ज़रा, नीचे आ, अभी तेरी हड्डी-पसली एक कर दूँ, बड़ा आया मुझे समझाने!”
“अरी, जा अपना काम कर। चली हे, अपनी ताकत दिखाने ! इतना बड़ा शरीर है, पर अक्ल रत्ती भर भी नहीं,” अकलू ने ताना मारा।
भैंस और अकलू की गरमागरम बातें जंगल में आग की तरह फैल गई। सभी जानवर इस झगड़े के बारे में बातें करने लगे। अंत में सबने तय किया कि किसी-न-किसी तरह इस झगड़े को खत्म करना चाहिए।
शाम हुई। जंगल के सभी जानवर तालाब के किनारे इकट्ठे हुए। सबकी राय से यह तय हुआ कि जो कोई इस तालाब को बीचो बीच से पार कर जाएगा, वही बड़ा है। इस प्रतियोगिता के निर्णायक के रूप में राजा शेर और उसकी सहायिका लोमड़ी रानी बनी।
जंगल के सभी जानवर यह मज़ेदार तमाशा देखने के लिए उत्सुक थे। आधे तालाब के इस पार और आधे उस पार जाकर जम गए। अकलू और भैंस भी प्रतियोगिता वाले स्थान पर निश्चित समय पर पहुँच गए। अकलू बहुत परेशान था। उसे तैरना तो आता ही न था। लेकिन इज्ज़त का सवाल था। अपनी परेशानी किसी दूसरे से बताता तो ‘अक्लमंद’ कैसे कहलाता?
बिना प्रयत्न किए हार मानना उसे मंजूर नहीं था। इसीलिए उसने चेहरे पर परेशानी का कोई भाव नहीं आने दिया। इधर भैंस मन-ही-मन बहुत खुश हो रही थी। उसे अपने बड़े शरीर और ताकत पर बहुत घमंड था। तालाब पार करना तो उसके लिए चुटकी बजाने जैसा था। वह अपनी मस्ती में झूम रही थी।
जब सारी तैयारियाँ पूरी हो गईं, तब लोमड़ी ने दोनों को सावधान किया। उसके ‘एक-दो-तीन’ कहने पर दोनों को तालाब में तैरना शुरू कर देना था। अकलू की परेशानी बढ़ गई। दिल धड़कने लगा। घबराहट के कारण उसे कुछ नहीं सूझ रहा था। उसे लगा कि आज वह जंगल के सभी जानवरों के सामने मूर्ख साबित हो जाएगा।
लोमड़ी के ‘एक दो तीन’ कहते ही प्रतियोगिता के लिए तैयार खड़ी भैंस तालाब में उत्तर गई। अकलू ने भी थोड़ी हिम्मत बाँधी और अक्ल लगाई। अचानक उसे एक तरकीब सूझ गई। अकलू खुशी से उछल पड़ा। उसने तालाब के किनारे लगे पेड़ों की इस डाली से उस डाली पर दो-चार छलाँगें लगाई और तालाब की तरफ झुकी हुई डाल पर जा पहुँचा।

भैंस अभी किनारे पर ही थी। बस अकलू वहीं से कूद पड़ा और धम्म से भैंस के सींग पकड़कर उसकी पीठ पर सवार हो गया। भैंस ने उसे गिराने के लिए एक-दो बार अपनी पूँछ चलाई, पर अकलू ने उसे भी पकड़ लिया।
जंगल के जानवर अकलू की चतुराई देखकर चकित रह गए। पर अभी हार-जीत का फैसला बाकी था। वे यह देखने के लिए उत्सुक थे कि देखें कौन जीतता हैं? भैंस तालाब के दूसरे किनारे के कुछ दूर ही थी कि अकलू ज़ोर से उछलकर किनारे पर आकर खड़ा हो गया। सभी जानवर अकलू की अक्लमंदी और जीत पर खुशी से चिल्ला उठे।
इधर भैंस बेचारी धीरे-धीरे पानी के बाहर निकली। जंगल के राजा शेर ने अपना निर्णय सुनाया-अक्लमंद अकलू यह प्रतियोगिता जीत गया। और उस दिन से लोगों को ‘अकल बड़ी या भैंस’ प्रश्न का उत्तर मिल गया।
__ अमृतलाल नागर
ये कहानी “अकल बड़ी या भैंस” एक प्रसिद्ध कहावत से लिया गया है, ये कहानी बताती है कि सिर्फ बलवान होने से काम नहीं चलता, सही समय पर दिमाग का प्रयोग करना आवश्यक है
‘अकल बड़ी या भैंस’ कहानी अमृतलाल नागर जी द्वारा लिखी गई है। ‘अकल बड़ी या भैंस’ कहानी एक अत्यंत शिक्षाप्रद कहानी है जिसमें शारीरिक बल से अधिक महत्व बौद्धिक बल को कहा गया है। अमृतलाल नागर जी ने अपनी कहानी ‘अकल बड़ी या भैंस’ में बलवान पत्र पहलवान और अफनती के रूम में बुद्धिमान पत्र का प्रयोग कर पाठकों को ये संदेख दिया है कि हर रूप से बाहु बल से अधिक शक्तिमान मानसिक बल होता है।
अंत में ‘अकल बड़ी या भैंस’ कहानी से हमे ये शिक्षा मिलती है कि कम शारीरिक बल होने के पश्चात भी व्यक्ति केवल अपनी बौद्धिक शक्ति के बल पर हर समस्या का समाधान कर सकता है।
‘अकल बड़ी या भैंस’ कहानी से बच्चों को ये शिक्षा देने की कोशिश की गई है कि कठिन से कठिन समय में घबराने के बजाय अपनी बुद्धि का और समझदारी का उपयोग करना चाहिए। ‘अकल बड़ी या भैंस’ कहानी ये सीखती है कि बुद्धि के द्वारा किसी भी बड़ी से बड़ी समस्या का हल निकाला जा सकता है।
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