कविता :- पुष्प की अभिलाषा
कवि परिचय :-
पंडित माखनलाल चतुर्वेदी की ख्याति एक लेखक, कवि, और वरिष्ठ साहित्यकार के रूप में हैं लेकिन वो एक स्वतंत्रता सेनानी भी थे। माखनलाल चतुर्वेदी का जन्म 4 अप्रैल 1889 को मध्य प्रदेश के होशंगाबाद जिले के बवाई गाँव में हुआ था। माखनलाल चतुर्वेदी के जन्म के समय भारत पर अंग्रेजों का शासन था एवं तब स्वाधीनता के लिए संघर्ष चल रहा था।
माखनलाल जब 16 वर्ष के हुए तब ही स्कूल में अध्यापक बन गए थे। उन्होंने कुछ समय तक एक विध्यालय में अध्यापन का कार्य किया। लेकिन जल्द ही माखनलाल ने अपने जीवन और लेखन कौशल का उपयोग देश की स्वतंत्रता के लिए करने का निर्णय ले लिए। राष्ट्र ने साहित्य जनत का यह अनमोल हीरा 30 जनवरी 1968 को खो दिया। माखनलाल चतुर्वेदी उस समय 79 वर्ष के थे, और देश को तब भी उनके लेखन से बहुत उम्मीदें थी।
माखनलाल चतुर्वेदी की प्रमुख रचनाएँ है – पुष्प की अभिलाषा, कैदी और कोकिला, बदरिया थम – थमकर झर री इत्यादि।
चाह नहीं मै सुरबाला के
गहनों में, गुँथा जाँऊ
( पस्तुत पंक्ति ‘पुष्प की अभिलाषा’ माखनलाल चतुर्वेदी जी द्वारा रचित है, जिसका अर्थ है:- मेरी यह इच्छा नहीं कि मैं किसी सुंदर स्त्री के गहनों में सज जाऊं)
चाह नहीं, प्रेमी – माला में
बिंध प्यारी को ललचाउँ,
( पस्तुत पंक्ति ‘पुष्प की अभिलाषा’ माखनलाल चतुर्वेदी जी द्वारा रचित है, जिसका अर्थ है:- मैं यह भी नई चाहता कि कोई प्रेमी मुझे माला में पिरो कर अपनी प्रेमिका को प्रसन्न करें)
चाह नहीं, सम्राटों के शव
पर हे हरी, डाला जाऊँ,
( पस्तुत पंक्ति ‘पुष्प की अभिलाषा’ माखनलाल चतुर्वेदी जी द्वारा रचित है, जिसका अर्थ है:- मेरी ये भी इच्छा नहीं कि मुझे सम्राटों के शवों पर चढ़ाया जाए)
चाह नहीं, देवों के शिर पर
चढुँ भाग्य पर इठलाऊँ ।
( पस्तुत पंक्ति ‘पुष्प की अभिलाषा’ माखनलाल चतुर्वेदी जी द्वारा रचित है, जिसका अर्थ है:- ना मेरी ये इच्छा है कि मैं देवी देवताओं के ऊपर चढ़ कर अपने अस्तित्व पर घमंड करू)
मुझे तोड़ लेना वनमाली !
( पस्तुत पंक्ति ‘पुष्प की अभिलाषा’ माखनलाल चतुर्वेदी जी द्वारा रचित है, जिसका अर्थ है:- मुझे तोड़ लेना हे वनमाली!)
उस पथ पर देना तुम फेंक,
मातृभूमि पर शीश चढ़ाने
जिस पथ जावे वीर अनेक ।
( पस्तुत पंक्ति ‘पुष्प की अभिलाषा’ माखनलाल चतुर्वेदी जी द्वारा रचित है, जिसका अर्थ है:- मुझे उस रस्ते में फेक देना जहां से मातृभूमि पर अपने प्राण न्यौछावर करने वाले वीर गुज़रते है)
— माखनलाल चतुर्वेदी
भावार्थ:-
प्रस्तुत कविता पुष्प की अभिलाषा पक्तियों में कवि कहते हैं की जब कभी माली अपने बगीचे से फूल तोडने जाता है तो जब माली से पूछता है कि तुम कहाँ जाना चाहते हो? माला बनना चाहते हो या भगवान के चरणों में चढ़ाया जाना चाहते हो तो इस पर फूल कहता है-
“मेरी इच्छा ये नहीं कि मैं किसी सुंदर स्त्री के बालों को गजरा बनूँ मुझे चाह नहीं कि मै दो प्रेसियों के लिए माला बनूँ मुझे ये भी चाह नहीं कि किसी राजा के शव पे मुझे चढ़ाया जाये मुझे चाह नहीं की मुझे भगवान पर चढ़ाया जाये और मै अपने आपको भाग्यशाली मानूं फेंक देना जहाँ शूरवीर मातृभूमि की रक्षा के लिए अपने शीश चढ़ाने जा रहे हों । मै उन शूरवीरों के पैरों तले आकर खुद पर गर्व महसूस करूँगा ।”
सारांश:-
कवि माखनलाल चतुर्वेदी जी ‘पुष्प की अभिलाषा‘ कविता में पुष्प या फूल के रूप में कहते हैं कि मुझे कोई चाह नहीं है कि मैं किसी स्त्री के गहनों में गूथँ जाऊं, मुझे कोई इच्छा नहीं है कि मैं किसी महिला के बालों का गजरा बनूँ मुझे कोई इच्छा नहीं की मैं किसी प्रेमी युगलों का माला बनूँ। मुझे इसकी बिल्कुल चाह नहीं है कि मैं फूल बनकर किसी राजा या सम्राट के शव पर चढ़ाया जाऊं।
मुझे इसकी भी इच्छा नहीं है कि मुझे भगवान के मस्तक पर अर्पित किया जाय जिससे मुझे अपने भाग्या भाग्य पर गर्व हो।
मैं सिर्फ इतना चाहता हूँ कि हे वनमाली तुम मुझे तोड़कर उस मार्ग पर फेंक देना जिस मार्ग पर वीर देशभक्त, शुरवीर इस भूमि की रक्षा के लिए अपने आप को अर्पण करने जाते हों, जो इस भूमि के लिए अपना शीश अर्पण करने जाते हो।
माखनलाल चतुर्वेदी जी के द्वारा रचित कविता “पुष्प की अभिलाषा” के अनुसार व्यक्ति को अपने स्वार्थ और भौतिक सुखों से ऊपर राष्ट्र को सर्वोपरि रखना चाहिए और देशप्रेम, त्याग और बलिदान की भावन को जागृत करना चाहिए।
इस कहानी में फूल की इच्छा है कि मै अपने आपको भाग्यशाली मानूं वहा फेंक देना जहाँ शूरवीर मातृभूमि की रक्षा के लिए अपने शीश चढ़ाने जा रहे हों । मै उन शूरवीरों के पैरों तले आकर खुद पर गर्व महसूस करूँगा। वह निस्वार्थ भाव से राष्ट्र के प्रति समर्पित होना चाहता है।
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