फेर-बदल
लेखक परिचय :-
मोहनदास करमचंद गांधी (जन्म-2 अक्टूबर, 1869-मृत्यु 30 जनवरी, 1948) को पूरी दुनिया ‘महात्मा गांधी’ अथवा ‘बापू’ के नाम से जानती है। उनका जन्म गुजरात के पोरबंदर नामक स्थान में हुआ था। इनके पिता का नाम करमचंद गांधी और माता का नाम पुतलीबाई था। गांधी जी ने ‘सत्य के प्रयोग’ नामक आत्मकथा मूल रूप से अपनी मातृभाषा गुजराती में लिखी थी। इस पुस्तक में गांधी जी ने अपने बचपन से लेकर सन 1921 तक की घटनाओं का वर्णन किया है। गांधी जी भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के एक प्रमुख राजनैतिक एवं आध्यात्मिक नेता थे।
कहानी :- फेर-बदल
विलायती रंग – ढंग अपनाते समय भी मैं एक हद तक सावधान रहता था। पाई – पाई खर्च का हिसाब रखता था। मैंने हर महीने पंद्रह पौंड से अधिक खर्च न करने का निश्चय किया। मैं अपना छोटे – से – छोटा खर्च भी लिखता था। मेरी यह आदत अंत तक बनी रही।
मैंने अपने रहन – सहन पर भी कुछ अंकुश लगाया। इस कारण मैं देख सका कि मुझे कितना खर्च करना चाहिए। मैंने अपना खर्च आधा कर डालने का निश्चय किया। हिसाब लगाने पर पता चला कि आने – जाने में मेरा काफ़ी खर्च होता था। मैंने तय किया कि मैं ऐसी जगह घर लूँगा जहाँ से काम की जगह पर आधे घंटे में पैदल पहुँचा जा सके और गाड़ी का किराया बचे। अब मुझे घूमने के लिए अलग से समय निकालने की जरूरत नहीं थी। काम पर जाते हुए मैं रोज आठ – दस मील घूम लेता था। खासकर इस एक आदत के कारण मैं शायद ही कभी विलायत में बीमार पड़ा। इसके कारण मेरा शरीर मजबूत हो गया।
इस तरह मेरा काफ़ी खर्च भी बचा। लेकिन समय का क्या हो? मैं जानता था कि बैरिस्टरी की परीक्षा के लिए बहुत पढ़ना जरूरी नहीं है। पर मेरी कमजोर अंग्रेजी मुझे दुख देती थी। लेली साहब के शब्द -“तुम बी०ए० हो जाओ, फिर आना – मुझे बहुत चुभते थे। मैंने सोचा मुझे बैरिस्टरी के अलावा कुछ और भी पढ़ना चाहिए।
किसी मित्र ने कहा, “अगर तुम्हें कोई कठिन परीक्षा देनी हो, तो लंदन की मैट्रिक्युलेशन पास कर लो। उसमें बहुत मेहनत करनी पड़ेगी। साधारण ज्ञान बढ़ेगा और खर्च बिलकुल नहीं होगा।” मुझे यह सुझाव अच्छा लगा। पर परीक्षा के विषय देखकर मैं चौंका। लैटिन और दूसरी एक भाषा अनिवार्य थी। लैटिन कैसे सीखी जाए?
पर मित्र ने सुझाया, “बैरिस्टरी के लिए लैटिन बहुत उपयोगी है। लैटिन जानने वाले के लिए कानूनी किताबें समझना आसान हो जाता है। इसके सिवा लैटिन जानने से अंग्रेजी भाषा भी समृद्ध होती है। इन सब दलीलों का मुझ पर असर हुआ। मैंने सोचा, चाहे कितनी भी कठिन क्यों न हो, पर लैटिन तो सीख ही लेनी है। फ्रेंच की शुरू की हुई पढ़ाई को पूरा करना था। इसलिए निश्चय किया कि दूसरी भाषा फ्रेंच हो। परीक्षा हर छठे महीने होती थी। मेरे पास मुश्किल से पाँच महीने का समय था। यह काम मेरे बूते के बाहर था।
अब मैं एक उद्यमी विद्यार्थी बन गया। मैंने अपने एक – एक मिनट का उपयोग किया। पर मेरी बुद्धि या स्मरण शक्ति ऐसी नहीं थी कि दूसरे विषयों के साथ – साथ मैं लैटिन और फ्रेंच की तैयारी भी कर सकूँ। परीक्षा में बैठा। लैटिन में फेल हो गया, पर हिम्मत नहीं हारी। लैटिन में अब मेरी रुचि बढ़ गई थी। मैंने सोचा कि दूसरी बार परीक्षा में बैठने से फ्रेंच अच्छी हो जाएगी और विज्ञान में नया विषय ले लूँगा।
परीक्षा देने की तैयारी के साथ ही रहन – सहन में अधिक सादगी लाने का प्रयत्न करने लगा। मैंने अनुभव किया कि अभी भी मेरा जीवन सादा नहीं है। मैंने देखा था कि मुझसे भी अधिक सादगी से रहने वाले लोग हैं। मैं ऐसे कुछ विद्यार्थियों के संपर्क में आया। एक विद्यार्थी लंदन की गरीब बस्ती में हफ़्ते के दो शिलिंग देकर एक कोठरी में रहता था। वह दो पेनी का कोको और रोटी खाकर गुजारा करता था। उससे स्पर्धा करने की शक्ति मुझमें नहीं थी। पर अनुभव किया, मैं भी एक कमरे में रह सकता हूँ और आधी रसोई अपने हाथ से बना सकता हूँ। इस प्रकार मैं हर महीने चार या पाँच पौंड में निर्वाह कर सकता हूँ।
मैंने एक अंगीठी खरीदी और सुबह का भोजन स्वयं बनाना शुरू किया। इसमें मुश्किल से बीस मिनट खर्च होते थे। दलिया बनाने और कोको के लिए पानी उबालने में आखिर कितना समय लगता? दोपहर का भोजन बाहर कर लेता और शाम को कोको के साथ रोटी खा लेता। इस तरह मैं एक से सवा शिलिंग के अंदर अपने भोजन की व्यवस्था करना सीख गया। यह मेरा अधिक – से – अधिक पढ़ाई का समय था। जीवन सादा बन जाने से समय अधिक बचा। दूसरी बार परीक्षा में बैठा और पास हुआ।
पर पाठक यह न समझें कि सादगी के कारण मेरा जीवन नीरस हो गया होगा। उलटे इस फेर – बदल के कारण मेरा जीवन अधिक सारमय बन गया और मेरे आत्मानंद का पार न रहा।

– मोहनदास करमचंद गांधी
गांधी जी ने बैरिस्टरी के साथ-साथ विदेशी भाषाएँ सीखीं और लंदन की मैट्रिक्युलेशन की परीक्षा पास की। गांधी जी ने कम-से-कम धन में गुज़ारा किया और अपने समय का सदुपयोग विद्यार्जन में किया। उन्होंने सादे जीवन में आत्मिक आनंद का अनुभव किया। आशा करती हुं की गांधी जी के जीवन से जूडे ये कहानी आप सभी अच्छी लगी होगी ?
“फेर-बदल“ कहानी हे ये सीखती है कि जीवन में वास्तविक प्रगति बाहरी दिखावे से नहीं होती, अपितु भीतर के कार्य कुशलता और सुलझेपन से होती है। मोहनदास करमचंद गांधी जी ने अपनी कहानी “फेर-बदल“ के द्वारा यह बताया है की अपने अपने जीवन में छोटे छोटे बदलाव कर के ये सिद्ध कर दिया है कि मनुष्य चाहे तो अपने आदतों पर नियंत्रण रख सकता है।
कहानी “फेर-बदल“ के द्वारा मुख्यतः ये संदेश दिया गया है कि कठिनाई और असफलताएं हमें आगे की ओर बढ़ने का हौसला देती है न कि हमें निराशा देती है।
कहानी “फेर-बदल“ हमें ये सीखती है कि सारा जीवन में विचारों को ऊंचा रखना चाहिए और स्वयं पर नियंत्रण रखना चाहिए। “फेर-बदल“ कहानी का मुख्य उद्देश्य ये है कि इसके द्वारा लोगों को अपने समय का पूरी तरह सदुपयोग करने की सलाह तथा उसके फायदे बताता है।
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