मै नर्क से बोल रहा हूँ
हे पत्थर पूजनेवालों ! तुम्हें जिन्दा आदमी की बात सुनने का अभ्यास नहीं; इसलिए मैं मरकर बोल रहा हूँ। जीवित अवस्था में तुम जिसकी ओर आँख उठाकर नहीं देखते उसकी सड़ी लाश के पीछे जुलूस बनाकर चलते हो। जिन्दगी – भर तुम जिससे नफरत करते रहे उसकी कब्र पर चिराग जलाने जाते हो। मरते वक्त तक जिसे तुमने चुल्लू – भर पानी नहीं दिया, उसकी हाड़ गंगाजी ले जाते हो। अरे, तुम जीवन का तिरस्कार और मरण का सत्कार करते हो। इसीलिए मैं मरकर बोल रहा हूँ। मैं नर्क से बोल रहा हूँ।
मगर मुझे क्या पड़ी थी कि जिन्दगी भर बेजुबान रहकर, यहाँ नर्क के कोने से बोलता ! पर यहाँ एक बात ऐसी सुनी कि मुझ अभागे की मौत को लेकर तुम्हारे यहाँ के बड़े – बड़े लोगों में चखचख हो गयी। मैंने सुना कि तुम्हारे यहाँ के मन्त्री ने संसद में कहा कि मेरी मौत भूख से नहीं हुई, मैंने आत्महत्या कर ली थी। मारा जाऊँ और खुद ही मौत का जिम्मेदार ठहराया जाऊँ?
भूख से माँ और भूख को मेरे मारने का श्रेय न मिले ?’ अन्न ! अन्न’ की पुकार करता मर जाऊँ और मेरे मरने के कारण में भी अन्न का नाम न आवे ? लेकिन खैर, मैं यह सब भी बरदाश्त कर लेता। जिन्दगी भर तिरस्कार का स्वाद लेते लेते सहानुभूति मुझे उसी प्रकार अरुचिकर हो गयी थी जिस प्रकार शहर के रहनेवाले को देहात का शुद्ध घी। लेकिन आज ही एक घटना और यहाँ इस लोक में घट गयी।
हुआ यह कि स्वर्ग और नर्क को जो दीवार अलग करती है, उसकी सेंध में से आज सबेरे मेरे कुत्ते ने मुझे देखा और ‘कुर – कुर’ करके प्यार जताने लगा। और मेरे आश्चर्य और क्षोभ का ठिकाना न रहा कि मैं यहाँ नर्क में और मेरा कुत्ता उस ओर स्वर्ग में। यह कुत्ता – मेरा बड़ा प्यारा कुत्ता, युधिष्ठिर के कुत्ते से अधिक ! जब से मेरी स्त्री एक धनी के साथ भाग गयी थी तभी से यह कुत्ता मेरा संगी रहा, ऐसा कि मरा भी साथ ही। कभी मुझे छोड़ा नहीं इसने।
बगल का सेठ इसे पालना चाहता था, सेठानी तो इसे बेहद प्यार करती थी, पर यह मुझे छोड़कर गया नहीं, लुभाया नहीं। सो मुझे सुख ही हुआ कि वह स्वर्ग में आनन्द से है पर मेरे अपने प्रति किये गये अन्याय को तो भुलाया नहीं जा सकता। और भाई यह तुम्हारा मृत्युलोक तो है नहीं जहाँ फरियाद नहीं सुनी जाती, जहाँ फरियादी को ही दण्ड दिया जाता है, जहाँ लालफीते के कारण आग लगने के साल – भर बाद बुझाने का आर्डर आता है। यहाँ तो फरियाद तुरन्त सुनी जाती है। सो मैं भी भगवान के पास गया और प्रार्थना की, “हे भगवान् !
पृथ्वी पर अन्याय भोगकर इस आशा से यहाँ आया कि न्याय मिलेगा, पर यह क्या कि मेरा कुत्ता तो स्वर्ग में और मैं नर्क में! जीवन – भर कोई बुरा काम नहीं किया। भूख से मर गया, पर चोरी नहीं की। किसी के आगे हाथ नहीं फैलाया। और कुत्ता जैसे कुत्ता होता है वैसा ही तो यह। कई बार आपका भोग खाते पिटा यह ! और इसे आपने स्वर्ग में रख दिया।”

“मै नर्क से बोल रहा हूँ”
और भगवान ने एक बड़ी बहीं देखकर कहा कि इसमें लिखा है कि तुमने आत्महत्या की। मैंने कहा कि नहीं महाराज, मैं भूख से मरा। मैंने आत्महत्या नहीं की। पर वे बोले,” नहीं, तुम झूठ बोलते हो। तुम्हारे देश के अन्न – मंत्री ने लिखा है कि तुमने आत्महत्या की। तुम्हारे शरीर के पोस्टमार्टम से यह बात सिद्ध हुई है।” और भगवान आसमान से गिरते – गिरते बचे, जब मैंने कहा कि महाराज, यह रिपोर्ट झूठ है। मेरा पोस्टमार्टम हुआ ही नहीं। अरे मैं तो जला दिया गया था। इसके दस दिन बाद संसद में प्रश्नोत्तर हुए। तो क्या मेरी राख का पोस्टमार्टम हुआ ? और तब मैंने उन्हें पूरा हाल सुनाया।
लो तुम भी सुनो। तुम नहीं जानते मैं कहाँ जिया, कहाँ रहा, कहाँ मरा? दुनिया इतनी बड़ी है कि कोई किसी का हिसाब नहीं रखता।
और तुम क्या जानो कि जब मेरी साँस चलती थी तब भी मैं जिन्दा था। मैं इस अर्थ में जीवित था कि मैं रोज मृत्यु को टालता जाता था। वास्तव में तो मैं जन्म के पश्चात् एक क्षण ही जीवित रहा और दूसरे क्षण से मेरी मौत शुरु हो गयी। तो बाजार की उस अट्टालिका को तो जानते हो। उसी के पीछे एक ओर से पाखाना साफ करने का दरवाजा है और दूसरी ओर दीवार के सहारे मेरी छपरी।
अट्टालिका का मालिक मेरी छपरी तोड़कर यहाँ भी अपना पाखाना बनाना चाहता था। अगर मैं मर न जाता तो गरीब आदमी की झोपड़ी पर अमीर के पाखाने की विजय भी इन आँखों से देखता। अब तो तुम मेरा स्थान जान गये होगे – आदमी से अधिक तो तुम अट्टालिका को पहचानते हो। अट्टालिका के सहारे आदमी को जानना तो तुम्हें खूब आता है।
बस यहीं झोंपड़ी में रहा मैं। मेरे आसपास अन्न – ही – अन्न था। दीवाल के पार से जो चूहे आते ये दिन – पर – दिन मोटे होते जाते और दो रोज तक तो वे इसलिए नहीं आये कि निकलने का थोड़ा मार्ग बनाते रहे। पर मैं फिर भी भूखा रहा। बेकार था। अनाज दस रुपये सेर था। इससे तो मेरे लिए मौत सस्ती थी।
आखिर मेरी मौत भी आयी। जिस दिन आयी, उस दिन अट्टालिका के उस पार वाले रईस के लड़के की शादी थी। बड़ा अमीर था। सारा गाँव जानता था कि उसके पास हजारों बोरे अन्न था, पर कोई कुछ नहीं कहता था। पुलिस उसकी रक्षा करती थी। और उस दिन मेरी मौत धीरे – धीरे काला पंजा बढ़ाती आती थी। मेरे पेट में ऐंठ आयी, आँखें धुँधली पड़ी। दीवाल के उस पार पकवानों की सुगन्ध आ रही थी। यही सन्तोष रहा कि पकवानों के बीच मेरी मौत हुई।
मौत के जरा पहले मेरा प्यारा कुत्ता बरबस दीवाल के उस पार घुस गया और पकवान खा गया। मालिक ने उसे खींचकर एक डण्डा मारा और वह कराहता हुआ मेरे पास आकर पड़ गया। चीखता रहा, चीखता रहा। मेरे भी प्राण निकल रहे थे। पर मुझे इस जानवर के सामने चीखने में लज्जा आयी। इधर मेरे पेट में आखिरी ऐंठ आयी और पंछी ने पिंजरा खाली किया, उधर मेरे कुत्ते का भी दम टूटा। डण्डे की चोट बड़े मर्म की थी। दोनों मरे, एक साथ मरे – फर्क इतना कि वह खाकर मरा और मैं बिना खाये।
उधर बारात उठी, इधर चाण्डालों ने टीन की गाड़ी में मुझे पटककर घसीटा। सड़क के उस ओर से अमीर के लड़के की बारात जा रही थी, इस ओर से मेरी यह सरकारी अर्थी। सरकार ने भोजन का प्रबन्ध नहीं किया था, पर मरनेवालों की लाशों को दफनाने का इन्तजाम बहुत अच्छा किया था। उधर बारात के पीछे मंगलगान हो रहा था। मेरी लाश के पीछे एक भी रोनेवाला नहीं था। ऐसी सफाई से मरा कि किसी को कष्ट न हुआ; कुत्ते तक को नहीं। बारात पहुँच गयी थी। गोले छूट रहे थे, और इधर अपर्याप्त लकड़ी में मेरी हड्डियाँ चटचटा रही थीं।
ऐसा मरा। और मरकर यहाँ जब आया तो मुझे कुछ दुख नहीं हुआ, जब मैं नर्क में भेज दिया गया। मैंने प्रतिवाद करना सीखा नहीं था और यह स्थान भी उससे ज्यादा खराब नहीं था जहाँ मैं जिन्दगी भर रह चुका था।
कहानी भगवान् ने सुनी। बोले, तुम भूख से मरे न? फिर भी तुम नर्क में रहोगे। और कुत्ता, स्वर्ग में रहेगा। और यह तुम्हारे बगल का कमरा उस झूठे मन्त्री के लिए खाली होगा।
मैंने पैर पकड़ लिये। बोला, “भगवान, यह कैसा न्याय है!”
वे बोले, “मूर्ख कायर, तू कुत्ते से भी हीन है। बेचारा कुत्ता दीवाल को लाँधकर घुस गया और खाना खा आया। और तू आदमी कहलाने वाला, हाय-हाय करके मर गया। तू दीवाल लाँघ नहीं सकता था? दीवाल तोड़ नहीं सकता था?”
‘‘लेकिन भगवान्!” मैंने कहा, “वह दीवाल कैसे तोड़ता ? कैसे लाँघता ? यह पाप न होता ?”
भगवान ने क्रोध से कहा, ” पाप – पुण्य के झमेले में पड़नेवाले कायर ! वह दीवाल क्या मेरी बनायी हुई है ? तमाम दीवालें आदमियों ने खड़ी की हैं? और तू उन्हें तोड़ने में पाप – पुण्य देखता है? मूर्ख ! तेरा कुत्ता तुझसे ज्यादा समझदार है। वह घुस गया, खाया और डण्डे की मार से मरकर यहाँ आ गया। उसमें मनुष्यत्व है, तुझमें पशुत्व भी नहीं! मैंने तुम्हें बुद्धि दी है, हाथ – पैर दिये हैं, कार्य शक्ति दी है और तू अकर्मण्य, बुजदिल कीड़े – सा मर गया। मनुष्यों ने मुझे बहुत निराश किया, अब मैं कुत्ते – ही-कुत्ते निर्माण करने का विचार कर रहा हूँ। तुम जैसे अकर्मण्य, कायर, भीरु, मूर्ख को नर्क नहीं तो क्या इन्द्रासन मिलेगा ?”
मैं नर्क में ढकेल दिया गया। और मैं इस कोने से तुमसे कह रहा हूँ कि हे। मेरे देशवासियों! मेरी जैसी मौत न मरना, मेरे कुत्ते की तरह मरना।
“मै नर्क से बोल रहा हूँ” कहानी का निष्कर्ष:-
“मै नर्क से बोल रहा हूँ” व्यंग्यकार हरिशंकर परसाई की एक अत्यंत प्रभावशाली कहानी है, मै नर्क से बोल रहा हु कहानी से लेखक ने समझ को संवेदनहीनता, गरीबी, भूख, अन्य और पाखंड पर तीखा व्यंग किया है। “मै नर्क से बोल रहा हूँ” कहानी का नायक भूख से मर जाता है लेकिन फिर भी सरकार और समाज उसकी मृत्यु की वास्तविकता का पता लगाने के स्थान पर उसे आत्महत्या घोषित कर लेती है।
“मै नर्क से बोल रहा हूँ” कहानी में लेखक ये दिखाना चाहते है कि जीवित मनुष्य की उपेक्षा की जाती है और मारने के बाद उसके लिए सहानुभूति व्यक्त की जाती है।
“मै नर्क से बोल रहा हूँ” कहानी का सबसे सबसे महत्वपूर्ण संदेश ये है कि मनुष्य को अपने जीवन और अधिकारों की स्वयं रक्षा करनी होती। जो व्यक्ति स्वयं की रक्षा नई करता उसकी रक्षा भगवान भी नहीं करता। “मै नर्क से बोल रहा हूँ” में लेखक कहना चाहते है कि बिना मेहनत किए, बिना संघर्ष किए केवल भाग्य को कोसते है, और समाज में जीवित इंसान कि कदर नहीं होती, लेकिन मरने के बाद उस इंसान का कद्र एवं किमत समझते है,”मै नर्क से बोल रहा हूँ” में कवि कहना चाहते है कि जो व्यक्ति अपने हक के लिए नहीं लड़ता, ईश्वर भी ऐसे कायर व्यक्ति के प्रति दयाभाव नहीं रखते है।
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