सरिता
अयोध्यासिंह उपाध्याय हरिऔध
किसे खोजने निकल पड़ी हो।
जाती हो तुम कहाँ चली।
ढली रंगतों में हो किसकी।
तुम्हें छल गया कौन छली ।।1।।

क्यों दिन-रात अधीर बनी-सी।
पड़ी धरा पर रहती हो।
दुःसह आतप शीत-वात सब
दिनों किस लिये सहती हो।।2।।

कभी फैलने लगती हो क्यों।
कृश तन कभी दिखाती हो।
अंग-भंग कर-कर क्यों आपे
से बाहर हो जाती हो ।।3।।

कौन भीतरी पीड़ाएँ।
लहरें बन ऊपर आती हैं।
क्यों टकराती ही फिरती हैं।
क्यों काँपती दिखाती है।।4।।

बहुत दूर जाना है तुमको
पड़े राह में रोड़े हैं।
हैं सामने खाइयाँ गहरी।
नहीं बखेड़े थोड़े हैं।।5।।

पर तुमको अपनी ही धुन है।
नहीं किसी की सुनती हो।
काँटों में भी सदा फूल तुम।
अपने मन के चुनती हो ।।6।।

उषा का अवलोक वदन।
किस लिये लाल हो जाती हो।
क्यों टुकड़े-टुकड़े दिनकर की।
किरणों को कर पाती हो ।।7।।

क्यों प्रभात की प्रभा देखकर।
उर में उठती है ज्वाला।
क्यों समीर के लगे तुम्हारे
तन पर पड़ता है छाला ।।8।।

*‘सरिता’ कविता का सारांश*
‘सरिता’ कविता में कवि ने नदी को मानवीय रूप में प्रस्तुत कर उसके जीवन-संघर्ष, गति और भावनाओं का मानवीय रूम में प्रस्तुत करने का प्रयत्न किया है। कवि सरिता से अनेक प्रश्न पूछते हुए उसके अस्थिर और निरंतर गतिशील स्वभाव को समझने का प्रयत्न करता है। कविता में नदी को एक ऐसी स्त्री के रूप में दर्शाया गया है, जो किसी अज्ञात लक्ष्य की खोज में निरंतर आगे बढ़ती रहती है। वह कभी विनम्र दिखाई देती है तो कभी प्रचंड रूप धारण कर लेती है।
कवि पूछते है कि नदी किसे ढूंढती हुई आगे बढ़ती जा रही है और किसके प्रेम या छल की पीड़ा ने उसे इतना व्याकुल बना दिया है। वह दिन-रात धूप, सर्दी और तेज हवाओं को झेलती हुई धरती पर आगे बढ़ती रहती है। कभी उसका जल फैल जाता है और कभी वह सूखकर पतली हो जाती है। कभी-कभी वह इतनी उग्र रूप में आ जाती है कि अपने किनारों को तोड़कर बाहर निकल जाती है। कवि इन परिवर्तनों को नदी के भीतर छिपे दुःख और पीड़ा का परिणाम मानते है।
कविता में आगे सरिता के संघर्षपूर्ण मार्ग का वर्णन किया गया है। उसके सामने गहरी खाइयाँ, चट्टानें और अनेक बाधाएँ हैं, फिर भी वह बिना रुके अपने लक्ष्य की ओर बढ़ती रहती है। वह किसी की एक नहीं सुनती और अपने मार्ग में आने वाले काँटों के बीच भी फूल चुनती चलती जाती है। इससे नदी के साहस, आत्मविश्वास और दृढ़ संकल्प देखने को मिलता है।
उषा की लालिमा और सूर्य की किरणों के प्रभाव से नदी के रूप में परिवर्तन होता रहता है। प्रभात की सुंदरता देखकर उसके हृदय में नई ऊर्जा और उत्साह जाग उठता है। ठंडे पवन के स्पर्श मात्र से उसमें हलचल उत्पन्न होने लगती है। इस प्रकार कवि ने प्रकृति और नदी के बीच के संबंध तथा सौंदर्य को अत्यंत भावपूर्ण ढंग से प्रस्तुत किया है।
अयोध्यासिंह उपाध्याय हरिऔध जी द्वारा लिखित कविता “सरिता” जैसी और कविताओं को पढ़ने के लिए हमारे स्पेशल कैटेगरी अयोध्यासिंह उपाध्याय हरिऔध को देखे। अगर आप हमारे द्वारा लिखे गए इस तरह के आर्टिकल्स में सहयोग देना चाहते है तो हमारे व्हाट्सएप चैनल को ज्वाइन कर के हमारे साथ जुड़िए। किसी भी प्रकार के सहयोग, प्रश्न अथवा सुझाव के लिए हमारे साथ व्हाट्सएप चैनल के माध्यम से हमसे जुड़े। धन्यवाद!
