Author: Mahima Choudhury

लोक कथा लोक कथा:- ‘लोक’ शब्द का अभिप्राय जन-सामान्य से है जो अभिजात्य संस्कार, शास्त्रीयता और पाण्डित्न की चेतना तथा अहंकार से शून्य है। इन लोक में प्रचलित कलाएँ लोक कला कहलाती है। लोक लोक कथा शब्द मोटे तौर पर लोक प्रचलित उन कथानकों के लिए व्यवहत होता है जो मौखिक-लिखित परंपरा से क्रमश: एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को प्राप्त होते रहें है। डॉ० सत्येन्द्र के अनुसार- “लोक में प्रचलित और परंपरा से चली आ रही मूलतः मौखिक रूप में प्रचलित कहानियाँ लोक कथा कहलाती है।” * लोक कथाओं की परंपरा अत्यंत प्राचीन है। → ऋगवेद में बहुत से…

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लोक नाट्‌य अर्थ और परिभाषा:- ‘लोक नाट्‌य, दो शब्दों लोक और नाट्य से मिलकर बना है। लोक का आशय उस जनसामान्य वर्ग से है जो अभिजात्य संस्कार, शास्त्रीयता, पाणिटंयू चेतना तथा अहंकार से शून्य है। नाट्य का तात्पर्य है नाटक अर्थात किसी कथानक को अभिनय द्वारा मंचन करना । अतः लोक नाट्‌य का अर्थ है लोक – कृति को नाट्‌यरूप में संवाद और अभिनय के माध्यम से किसी कथानक को प्रस्तुत करना। इसे आकर्षक बनाने के लिए नृत्य, संगीत, वेशभूषा आदि का प्रयोग किया जाता है। डॉ० श्रीराम शर्मा के अनुसार- वह नाटक लोक नाट्‌य कहलाता है जो लोक…

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लोक गीत लोक गीत:- ‘लोक’ शब्द का तात्पर्य जन-सामान्य वर्ग से है जो अभिजात्य संस्कार, शास्त्रीयता, पांडित्य की चेतना तथा अहंकार से सून्य है। इसी लोक समाज में विभिन्न अवसरों पर गाए जाने वाले गीत लोकगीत कहलाते है। डॉ० रामनरेश त्रिपाठी ने लोकगीतों को ग्राम्य गीत कहां है। डॉ० सत्येंद्र के अनुसार:- वह गीत जो लोक मानस की अभिव्यक्ति से अथवा जिनमें लोकमानस भाव हो, लोकगीत के अंतगर्त आता है। देवेंद्र सत्यार्थी के अनुसार- ” लोकगीत किसी संस्कृति के मुँह बोले चित्र होते है।” हीरामणि सिंह साथी के अनुसार- लोकगीत जनमानस की कोख से उपजे धरती के गीत हैं जिनमें…

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लोक साहित्य ⇒परिभाषा और वर्गीकरण: साहित्य मानव मन की प्रतिछवी है। यह मानव मन के भाव, दशा, सामाजिक स्थितियों तथा विभिन्न परिस्थितियों की सहज अभिव्यक्ति है। साहित्य दो प्रकार के होते है: शिष्ट साहित्य और लोक साहित्य । ‘लोक’ शब्द का अभिप्राय जन-सामान्य से है जो अभिजात्य संस्कार, शास्त्रीयता, पाण्डित्य की चेतना तथा अंहकार से शून्य है। वैदिक साहित्य से लेकर वर्तमान समय तक लोक शब्द का प्रयोग इन्हीं जनसामान्य के लिए हुआ है। अर्थात् लोक साहित्य का तात्पर्य जनसामान्य और ‘Folk Music’समाज के साहित्य से है। वस्तुतः लोक साहित्या अंग्रेजी भाषा के ‘folk Literature’ का हिन्दी अनुवाद है। पाश्चात्…

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प्रश्न २) सूरदास के काव्य में संयोग-श्रृंगार का वर्णन कीजिए। उत्तरः सूरदास के काव्य में संयोग-श्रृंगार का वर्णन :- सूरदास कृष्ण भक्तिधारा के सर्वश्रेष्ठ कवियों में माने जाते हैं। ‘सूरसागर’ में उन्होंने राधा-कृष्ण की बाल लीलाओं, प्रेम-व्यवहार, नख-शिख वर्णन तथा संयोग-वियोग की विविध स्थितियों को अत्यंत सुंदरता से प्रस्तुत किया है। उनके काव्य में संयोग-श्रृंगार का वर्णन मधुरता, कोमलता, प्रकृति-सौंदर्य और दिव्य प्रेम से ओत-प्रोत दिखाई देता है। सूरदास का संयोग श्रृंगार केवल लौकिक या शारीरिक प्रेम नहीं, बल्कि आध्यात्मिक अनुभूति का माध्यम बन जाता है, जो उन्हें अन्य श्रृंगार-कवियों से विशेष बनाता है। 1. राधा-कृष्ण के मिलन दृश्यों…

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(प्रश्न ) कबीरदास की भक्ति भावना पर आलोकपात। प्रस्तावना : संत कबीरदास भक्तिकाल के निर्गुण काव्यधारा के प्रमुख कवियों में एक है। कबीर पहले एक भक्त बाद में कवि है। उनका व्यक्तित्व बहुआयामी है- कबीर एक संत, ज्ञानातयी कवि, निर्गुण परमात्मा के परम् भक्त, समाज में व्याप्त, विकृतियाँ यथा- जातिवाद, साम्प्रदायिक कट्टरता, दुआइत, बाहयआडम्बरों, धार्मिक पाखण्ड, ब्राहमणवाद, रूढ़िवाद आदि का कठोर विरोध करने वाले समाज सुधारक और बहु‌तुत रहस्यवादी दार्शनिक है। -भावना को निम्नांकित शीर्षकों के आलोक कबीरदास की भक्ति में देखा जा सकता है – 1. निर्गुण उपासना : कबीर के आराध्य ‘राम’ दशरथ नंदन नहीं है, में आशवादी…

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कबीरदास रहस्यवादी कवि & काव्य में संयोग-श्रृंगार का वर्णन प्रश्न:- कबीरदास रहस्यवादी कवि हैं, स्पष्ट कीजिए। उत्तर :- कबीरदास हिंदी साहित्य के अ‌द्वितीय संत-कवि हैं, जिनकी काव्य-दृष्टि में आध्यात्मिक अनुभूति, आत्मा और परमात्मा का एकत्व, ईश्वर-प्रेम तथा आंतरिक साधना की गहराई प्रमुख रूप से दिखाई देती है। कबीर का रहस्यवाद बाहरी कर्मकांडों, पूजा-पद्धतियों और संप्रदायगत सीमाओं से परे जाकर सीधे मानव-हृदय और आत्मा को संबोधित करता है। इसी कारण उन्हें रहस्यवादी कवि कहा जाता है। उनका काव्य मानव-मन को अंतर्मुखी बनाता है और आत्मा को ईश्वर की ओर उन्मुख करता है। 1. आत्मा और परमात्मा के मिलन की अनुभूति:- कबीरदास…

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आः धरती कितना देती है सुमित्रानंदन पंत मैने छुटपन में छिपकर पैसे बोये थे सोचा था पैसों के प्यारे पेड़ उगेंगे, रुपयों की कलदार मधुर फसलें खनकेंगी, और, फूल फलकर मै मोटा सेठ बनूगा ! पर बन्जर धरती में एक न अंकुर फूटा, बन्ध्या मिट्टी ने एक भी पैसा उगला । सपने जाने कहां मिटे, कब धूल हो गये। मै हताश हो, बाट जोहता रहा दिनो तक, बाल कल्पना के अपलक पांवड़े बिछाकर । मै अबोध था, मैने गलत बीज बोये थे, ममता को रोपा था, तृष्णा को सींचा था। अर्धशती हहराती निकल गयी है तबसे । कितने…

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वृक्ष रामधारी सिंह ‘दिनकर’ (१) पहली पंक्ति लिखी विधि ने जिस दिन कविता की, उस दिन पहला वृक्ष स्वयं उत्पन्न हो गया। प्रथम काव्य है वृक्ष विश्व के पहले कवि का। (२) दुमों को प्यार करता हूँ। प्रकृति के पुत्र ये bमां पर सभी कुछ छोड़ देते हैं, न अपनी ओर से कुछ भी कभी कहते। प्रकृति जिस भांति रखना चाहती उस भांति ये रहते। भावार्थ:- वृक्ष कविता रामधारी सिंह दिनकर जी द्वारा लिखित कविता है। इस कविता के माध्यम से रामधारी सिंह दिनकर जी ने वृक्षो के महत्व और उनके सरलता तथा त्यागपूर्ण स्वभाव अत्यंत सुंदर और प्रभावी…

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