- धूप का टुकड़ा (सुमित्रा नंदन पंत)
- संध्या सुंदरी (सूर्यकांत त्रिपाठी निराला)
- जागो फिर एक बार २ (सूर्यकांत त्रिपाठी निराला)
- गहन है या अंधकार (सूर्यकांत त्रिपाठी “निराला)
- एक तिनका (अयोध्यासिंह उपाध्याय हरिऔध)
- पानी की प्रार्थना (केदारनाथ सिंह)
- विद्यापति (भक्त कवि या श्रृंगारी कवि)
- गा की वर्षा पावक कण (सुमित्रानंदन पंथ)
Author: Mahima Choudhury
धूप का टुकड़ा सुमित्रा नंदन पंत एक धूप का हँसमुख टुकड़ा तरु के हरे झरोखे से झर अलसाया है धरा धूल पर चिड़िया के सफ़ेद बच्चे सा! उसे प्यार है भू-रज से लेटा है चुपके ! वह उड़ कर किरणों के रोमिल पंख खोल तरु पर चढ़ ओझल हो सकता फिर अमित नील में! लोग समझते मैं उसको व्यक्तित्व दे रहा कला स्पर्श से ! मुझको लगता वही कला को देता निज व्यक्तित्व स्वयं व्यक्तिवान् ज्योतिर्मय जो ! भूरज में लिपटा श्री शुभ्र धूप का टुकड़ा वह रे स्वयंप्रकाश अखंड प्रकाशवान ! “धूप का टुकड़ा” कविता का सारांश:- धूप का…
संध्या सुंदरी सूर्यकांत त्रिपाठी निराला दिवसावसान का समय मेघमय आसमान से उतर रही है वह संध्या-सुंदरी परी-सी धीरे धीरे धीरे तिमिरांचल में चंचलता का नहीं कहीं आभास, मधुर-मधुर हैं दोनों उसके अधर, – किंतु गंभीर, नहीं है उनमें हास-विलास । हँसता है तो केवल तारा एक गूंथा हुआ उन घुँघराले काले बालों से, हृदय-राज्य की रानी का वह करता है अभिषेक। अलसता की-सी लता किंतु कोमलता की वह कली, सखी नीरवता के कंधे पर डाले बाँह, छाँह-सी अंबर-पथ से चली। नहीं बजती उसके हाथों में कोई वीणा, नहीं होता कोई अनुराग-राग आलाप, नुपुरों में भी रुन-झुन रुन-झुन रुन-झुन नहीं,…
जागो फिर एक बार २ सूर्यकांत त्रिपाठी निराला जागो फिर एक बार ! प्यार जगाते हुए हारे सब तारे तुम्हें अरुण-पंख तरुण-किरण खड़ी खोलती है द्वार- जागो फिर एक बार ! आँखे अलियों-सी किस मधु की गलियों में फँसी, बन्द कर पाँखें पी रही हैं मधु मौन अथवा सोयी कमल-कोरकों में?- बन्द हो रहा गुंजार- जागो फिर एक बार ! अस्ताचल चले रवि, शशि-छवि विभावरी में चित्रित हुई है देख यामिनीगन्धा जगी, एकटक चकोर-कोर दर्शन-प्रिय, आशाओं भरी मौन भाषा बहु भावमयी शिशिर-भार-व्याकुल कुल खुले फूल झूके हुए, आया कलियों में मधुर मद-उर-यौवन उभार- जागो फिर एक बार…
गहन है या अंधकार सूर्यकांत त्रिपाठी “निराला गहन है यह अंधकारा; स्वार्थ के अवगुंठनों से हुआ है लुंठन हमारा। खड़ी है दीवार जड़ की घेरकर, बोलते है लोग ज्यों मुँह फेरकर इस गगन में नहीं दिनकर; नही शशधर, नही तारा। कल्पना का ही अपार समुद्र यह, गरजता है घेरकर तनु, रुद्र यह, कुछ नही आता समझ में कहाँ है श्यामल किनारा। प्रिय मुझे वह चेतना दो देह की, याद जिससे रहे वंचित गेह की, खोजता फिरता न पाता हुआ, मेरा हृदय हारा। “गहन है या अंधकार” कविता का सारांश सूर्यकांत त्रिपाठी द्वारा रचित “गहन है या अंधकार”…
एक तिनका अयोध्यासिंह उपाध्याय हरिऔध मैं घमण्डों में भरा ऐंठा हुआ । एक दिन जब था मुण्डेरे पर खड़ा । आ अचानक दूर से उड़ता हुआ । एक तिनका आँख में मेरी पड़ा मैं झिझक उठा, हुआ बेचैन-सा । लाल होकर आँख भी दुखने लगी । मूँठ देने लोग कपड़े की लगे । ऐंठ बेचारी दबे पाँवों भगी जब किसी ढब से निकल तिनका गया । तब ‘समझ’ ने यों मुझे ताने दिए । ऐंठता तू किसलिए इतना रहा । एक तिनका है बहुत तेरे लिए “एक तिनका” कविता का सारांश :- अयोध्यासिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’ द्वारा रचित शीर्षक “एक तिनका”…
पानी की प्रार्थना केदारनाथ सिंह प्रभु, मैं – पानी – पृथ्वी का प्राचीनतम नागरिक आपसे कुछ कहने की अनुमति चाहता हूं यदि समय हो तो पिछले एक दिन का हिसाब दूँ आपको अब देखिए न इतने दिनों बाद कल मेरे तट पर एक चील आई प्रभु, कितनी कम चीलें दिखती हैं आजकल आपको पता तो होगा कहाँ गईं वे ! पर जैसे भी हों कल एक वो आई और बैठ गई मेरे बाजू में पहले चौंककर उसने इधर उधर देखा फिर अपनी लम्बी चोंच गड़ा दी मेरे सीने में और यह मुझे अच्छा लगता रहा प्रभु लगता रहा जैसे घूँट…
विद्यापति (भक्त कवि या श्रृंगारी कवि) आदिकाल के प्रसिद्ध कवि विद्यापति की साहित्यिक प्रतिष्ठा मूलतः ‘पदावली’ के कारण है। पदावली में सीमित मात्रा तो कई विशेषताएं हैं, किन्तु इसका केन्द्रीय विषय राधा-कृष्ण प्रेम है। यह हिन्दी में कृष्ण भाक्त साहित्य की शुरुआती रचना है, जिस पर जयदेव और चण्डीदास जैसे कवियों भक्ति का प्रभाव साफ नजर द्वारा विकसित श्रृंगार मिश्रित आता है। हिन्दी साहित्य में पदावली के विषयवस्तु को लेकर गहरा विवाद है कि इन्हें भांक्त विषयक पद माना जाय या श्रृंगार विषयक । विद्वानों का एक वर्ग मानता है कि ये पदं मूल चेतना में श्रृंगारिक हैं। इस…
गा की वर्षा पावक कण सुमित्रानंदन पंथ गा, कोकिल, बरसा पावक-कण! नष्ट-भ्रष्ट हो जीर्ण-पुरातन, ध्वंस-भ्रंस जग के जड़ बन्धन ! पावक-पग धर आवे नूतन, हो पल्लवित नवल मानवपन ! गा, कोकिल, भर स्वर में कम्पन! झरें जाति-कुल-वर्ण-पर्ण घन, अन्ध-नीड़-से रूढ़ि-रीति छन, व्यक्ति-राष्ट्र-गत राग-द्वेष रण, झरें, मरें विस्मृति में तत्क्षण! गा, कोकिल, गा, कर मत चिन्तन ! नवल रुधिर से भर पल्लव-तन, नवल स्नेह-सौरभ से यौवन, कर मंजरित नव्य जग-जीवन, गूँज उठें पी-पी मधु सब-जन ! गा, कोकिल, नव गान कर सृजन ! रच मानव के हित नूतन मन , वाणी, वेश, भाव नव शोभन, स्नेह, सुहृदता हो मानस-घन,…
फूल और कांटा अयोध्यासिंह उपाध्याय हरिऔध हैं जन्म लेते जगह में एक ही, एक ही पौधा उन्हें है पालता रात में उन पर चमकता चाँद भी, एक ही सी चाँदनी है डालता। मेह उन पर है बरसता एक सा, एक सी उन पर हवाएँ हैं बही पर सदा ही यह दिखाता है हमें, ढंग उनके एक से होते नहीं। छेदकर काँटा किसी की उंगलियाँ, फाड़ देता है किसी का वर वसन प्यार-डूबी तितलियों का पर कतर, भँवर का है भेद देता श्याम तन । फूल लेकर तितलियों को गोद में भँवर को अपना अनूठा रस पिला,…
कर्मवीर अयोध्यासिंह उपाध्याय हरिऔध देख कर बाधा विविध, बहु विघ्न घबराते नहीं रह भरोसे भाग्य के दुख भोग पछताते नहीं काम कितना ही कठिन हो किन्तु उकताते नहीं भीड़ में चंचल बने जो वीर दिखलाते नहीं हो गये एक आन में उनके बुरे दिन भी भले सब जगह सब काल में वे ही मिले फूले फले। आज करना है जिसे करते उसे हैं आज ही सोचते कहते हैं जो कुछ कर दिखाते हैं वही मानते जी की हैं, सुनते हैं सदा सबकी कही जो मदद करते हैं अपनी इस जगत में आप ही भूल कर वे दूसरों का मुँह…
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