(प्रश्न ) कबीरदास की भक्ति भावना पर आलोकपात।
प्रस्तावना :
संत कबीरदास भक्तिकाल के निर्गुण काव्यधारा के प्रमुख कवियों में एक है। कबीर पहले एक भक्त बाद में कवि है। उनका व्यक्तित्व बहुआयामी है- कबीर एक संत, ज्ञानातयी कवि, निर्गुण परमात्मा के परम् भक्त, समाज में व्याप्त, विकृतियाँ यथा- जातिवाद, साम्प्रदायिक कट्टरता, दुआइत, बाहयआडम्बरों, धार्मिक पाखण्ड, ब्राहमणवाद, रूढ़िवाद आदि का कठोर विरोध करने वाले समाज सुधारक और बहुतुत रहस्यवादी दार्शनिक है।
-भावना को निम्नांकित शीर्षकों के आलोक कबीरदास की भक्ति में देखा जा सकता है –
1. निर्गुण उपासना : कबीर के आराध्य ‘राम’ दशरथ नंदन नहीं है, में आशवादी सिद्धांतो पर आधारित ईश्वर नहीं है। उन्होंने सगुणता का सायास खण्डन किया है। कबीर के निर्गुण ईश्वर निराकार, अजन्मा, सर्वशक्तिमान, सर्वव्यापी, कण-कण में स्थित परक्रष्म है। उन्होंने निर्गुण भक्ति करने के लिए सरलता की दृष्टि में उसे राम, हरि, खुदा आदि नामों से पुकारा है।
-“दक्षरत सुत तिहुँ लोक बखाना। राम नाम का मरम है आना ॥” निर्गुण राम जपहुँ रे भाई।” –
कबीरदास के ईश्वर सर्वथापी, सभी के भीतर स्थित है किंतु माया के जाल में फँसा जीव यत्र-तत्र ईश्वर को बाहय जगत में, उसी मृग की तरह खेजता रहता है जो अपने भीतर स्थित कस्तुरी के सुंगध को अज्ञानता वश वनों में खेजता रहता
“कस्तुरी कुंडली बसै, मृर्ग इंटे वन माहिं। ऐसे है। घरि-घरि राम हैं, दुनिया देखे नारि ॥”
२. एकेश्वरवाद : कवीर बहुदेववाद को नहीं मानते। उनपर शंकराचार्य के अद्वैतवाद का प्रभाव है। उन्होंने निर्गुण निराकार ब्रहम को ही एकमात्र स्वीकार किया है और अवतार को जन्ममरण के बंधन से ग्रसित बताया है।
– “दुई जगदीस कहाँ नै आमा कटु कौन भरमायाা। हिंदुं तुरक की एक एक राह है, सतगुरू कहीं बताई।”
3. राम नाम की महिमा: यह सर्वविदित है कि कबीरदास निर्गुण राम के उपासक है। उन्होंने अपने आराध्य के लिए राम, साई, हरि, रहीम, खुदा, अल्लाह आदि नामों का प्रयोग किया है किंतु विभिन्न नामों में राम नाम को पूरी गंभीरता से और बार-बार लिया है। कर पूर्ण समर्पण और शुद्धता पर कबीर नाम जाप के साथ-साथ मन की एकाग्रता, विशेष बल देते है।
“कबीर निर्भर्थी राम जपु, जब लागे दीप बाति। तेल छटा बाती जुलै, तब सोवैगा दिन राति ।।”
4. दास्य भक्तिः कबीरदास की भक्ति मूलतः सेवक-सेन्य भावा अकति दास्य भाव की है। कबीर स्वयं को अधम, तुच्छ मानते है और अपने आराध्य को सर्वशक्तिमान, मुधिदाता कहते है।
– मैं गुलाम मोही बेंची गोलाई।…..
“कवीरं कुत्ता राम का, मुतिया मेरा नाऊँ। गर्ने राम की जेबड़ी, जित खेचे तित जाऊँ ।।”
5. कांता भक्ति : संत परम्परा के अनुरूप कबीरदास, स्वयं को स्त्री और परमात्मा को पुरुप मानते है। इसे मधुरामधि, प्रेम लक्षणा भक्ति या कांता भक्ति कहा जाता है जहाँ जीवात्मा और परमात्मा के बीच दाम्पत्य प्रेम की अभिन्नक्ति होती है। यह कबीर का सरस रहस्यवाद है जहाँ एक अज्ञात सत्ता के प्रति प्रेम और मिलन की तीव्र विकलता द्रष्टव्य है।

– “दुलहिन गावडु मंगलाचार, हरि परि आए थे, राजा राम भरतार ।”
– ” हरि गैरा पीत गै राम की बहुरिया । राम बड़े मैं इन्क लहुरिया ॥”
– ” आँखीया माई परी, पंक निगरि निहारि ।
– ” जीमड़ियाँ छाला परा, राम पुकारि-चुकारि ॥”
6. वात्सल्य भक्ति : कबीरदास के काव्य में यत्र-तत्र वात्सल्य का मनभावन रूप सामने आता है। कबीर स्वयं को बालक और ईश्वर की जननी करते हैं-
“हरि जननी मैंः बालक तोरा। काहे ना अवगुन बकसटु मेरा ॥”
7. वैराग्य भावना : कबीर की भक्ति-भावना के प्रारंभिक चरण में नाथ परम्परा का हठ योग और वैराग्य दिखाई देता है। वैराग्य का तात्पर्य कबीर के अनुसार संसार का त्याग करके जंगल में अकर्मण्य बन जाना नहीं है बल्कि संसार में रहते हुए संतोषवृति लाना, विषय – भोगों के प्रति अनासक्त होना, आशा, तृष्णा, मोह से मुक्त होना वैराग्य है। कबीर के अनुसार जगत मिथ्या है और सांसारिक संबंध स्वामिन्य और संणभंगुर है।
– ” हम घर जाल्या आपणों, लिया मुराता हान्थि। अब घर जालौं लस का, जे चलै हमारे सानि ॥”
8. पूर्ण समर्पण की भावना: कबीरदास संसारासक्ति से पूर्णतः मुक्त होकर सर्वशक्तिमान परमात्मा के प्रति पूर्ण समर्पित है। नवधा भक्ति के अन्तर्गत आत्मनिवेदन कहलाता है। यह
– ” कबीर तेरी सरनि आया, राठि लेड भगवान।”
9. गुरु और सत्संग की महत्ता : कबीरदास ने सुरु का स्थान बिना गुरु कृपा ईश्वर से भी श्रेष्ठ बताया है। कबीर के अनुसार के भक्ति और ईश्वर प्राप्ति सुलभ नहीं है। गुरु की महिमा अनंत है जो वर्णनातीत है। कबीर ने सत्संग पर विशेष बल दिया है। साधु संगति द्वारा अवगुणी से अवगुणी नीव भी गुणों से युक्त हो सकता है-
– ” सतगुरु की महिमा अनंत, अनंत किया उपगार । लोचन अनंत उद्याड़ियां, अनंत दिखावणहार ॥”
-कबीर संगति साधु की, करें न निरफल होई। चन्दन होसी बावना, नीमा नः कासी कोई ॥”
10.बाह्य आडम्बर से रहित भक्ति : कबीरदास की भक्ति मूर्तिपूजा, तिलक, यज्ञ, मुण्डन, अनुष्ठान, कर्मकाण, बाति आदि से मुक्त, पवित्र आचरण, मन की शुद्धता और मानसिक नाम स्मरण पर केन्द्रित है।
– ” माला ने कर में फिरै, जीभ किरै मुख माहित मनुग हो दस दिखिः फिरै, यह तो सुमिरन नाहित॥ दिन में रोजा रखत है, सति हनन है गाए। यह तो खून वह बंदगी, ऐसे खुशी खुदाय ॥”
निस्कर्ष : अता कवीर की भक्ति प्रेम और मानवता पर आधारित निष्काम भक्ति है जिसमे एकाग्रताः, अहंकार का त्याग, पूर्ण समर्पण, बाहय आडंबरों का त्याग अनिवार्य शर्त है। है। कबीर की अनि सहज हैं, मैं ऐसे मंदिर के पुजारी है. है. ति जिसकी फर्श हरी-हरी घास, जिसकी दिवारें दसों दिशाएँ, जिसकी छत नीले गगन की छतरी है जो सभी मनुष्य के लिए सदैव खुला है। कबीर ने अपनी निर्गुण अदि को मध्य मार्ग का अनुसरण करके प्रगाढ़ किया है।
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