जागो फिर एक बार २
सूर्यकांत त्रिपाठी निराला
जागो फिर एक बार !
प्यार जगाते हुए हारे सब तारे तुम्हें
अरुण-पंख तरुण-किरण
खड़ी खोलती है द्वार-
जागो फिर एक बार !
आँखे अलियों-सी
किस मधु की गलियों में फँसी,
बन्द कर पाँखें
पी रही हैं मधु मौन
अथवा सोयी कमल-कोरकों में?-
बन्द हो रहा गुंजार-
जागो फिर एक बार !
अस्ताचल चले रवि,
शशि-छवि विभावरी में
चित्रित हुई है देख
यामिनीगन्धा जगी,
एकटक चकोर-कोर दर्शन-प्रिय,
आशाओं भरी मौन भाषा बहु भावमयी
शिशिर-भार-व्याकुल कुल
खुले फूल झूके हुए,
आया कलियों में मधुर
मद-उर-यौवन उभार-
जागो फिर एक बार !
पिउ-रव पपीहे प्रिय बोल रहे,
सेज पर विरह-विदग्धा वधू
याद कर बीती बातें, रातें मन-मिलन की
मूँद रही पलकें चारु
नयन जल ढल गये,
लघुतर कर व्यथा-भार
जागो फिर एक बार !
सहृदय समीर जैसे
पोछों प्रिय, नयन-नीर
शयन-शिथिल बाहें
भर स्वप्निल आवेश में,
आतुर उर वसन-मुक्त कर दो,
सब सुप्ति सुखोन्माद हो,
छूट-छूट अलस
फैल जाने दो पीठ पर
कल्पना से कोमन
ऋतु-कुटिल प्रसार-कामी केश-गुच्छ ।
तन-मन थक जायें,
मृदु सरभि-सी समीर में
बुद्धि बुद्धि में हो लीन
मन में मन, जी जी में,
एक अनुभव बहता रहे
उभय आत्माओं मे,
कब से मैं रही पुकार
जागो फिर एक बार !
उगे अरुणाचल में रवि
आयी भारती-रति कवि-कण्ठ में,
क्षण-क्षण में परिवर्तित
होते रहे प्रकति-पट,
गया दिन, आयी रात,
गयी रात, खुला दिन
ऐसे ही संसार के बीते दिन, पक्ष, मास,
वर्ष कितने ही हजार-
जागो फिर एक बार !
“जागो फिर एक बार” कविता का सारांश:-
सूर्यकांत त्रिपाठी निराला जी द्वारा रचित “जागो फिर एक बार” कविता एक अत्यंत प्रेरणादायक कविता है। इस कविता के माध्यम से कवि सोए हुए मानव, विशेषकर युवाओं को और राष्ट्रवासियों को जगाने का तथा उन्हें उनके कर्तव्यों के प्रति जागरूक होने का संदेख दिया है।
कविता में प्रकृति के मनिहार चित्रण द्वारा नवजागरण के आह्वाहन का प्रयास किया गया है।
कविता के आरम्भ में कवि कहते है कि रात बीत रही है और तारे प्रेमपूर्वक जागने का प्रयास कर चुके है और अब सुबह की लालिमा लिए नवयुवती सी सूर्य की किरणे दरवाजे पर खड़ी है। प्रकृति का हर एक अंश जागने का संकेत दे रहा है, इसी कारण अब निद्रा में डूबे रहने का कोई सवाल नहीं है। अगले पंक्ति में कवि सोए हुए मानव समझ का चित्रण करते हुए कहते है कि उसकी आँखें मानो किसी मधुर स्वप्न में खोई हुई है। फूलों, भंवरों, और प्रकृति की सुंदर और मधुर गतिविधियां उसे जागने का प्रयत्न कर रही है।
इसके पश्चात कवि संध्या एवं रजनी का के सुंदर दृश्यों का चित्रण करते है। चांदनी रात, सुगंधित फूल, चकोर पक्षी के चंद्र दर्शन और प्रकृति का यौवन से परिपूर्ण वातावरण जीवन की सुंदरता और सक्रियता का प्रतीक बन जाता है। पापिहों की पुकार, विरहिन वधू की व्यथा और प्रेम की यादें भी जीवन की संवेदनाओं को जागृति करने में सहयोग देती है। कवि इन सब पंक्तियों के द्वारा मानव के हृदय को झकझोरने का प्रयास करते है।
कविता के अगले पंक्ति में कवि ने प्रेम और आत्मा के मिलन की भावना की अभिव्यक्ति की है। कवि चाहते है कि मनुष्य अपना आलस्य, मूढ़ता और अज्ञानता का त्याग कर जीवन के उच्चतम अनुभवों को प्राप्त करें। वो आत्मा और आत्मा के मिलन, हृदय की जागृति तथा चेतना के विस्तारबकी बात करते हैं। यह जागरण केवल शारीरिक न होकर मानसिक, आध्यात्मिक तथा भावात्मक भी है।
अंतिम पंक्तियों में कवि बताते है कि समय निरंतर गतिशील है। दिन – रात, ऋतुएं, महीने और हजारों वर्ष इसी प्रकार बीतते चले गए। प्रकृति निरंतर परिवर्तनशील है, इसी कारण मनुष्य को भी निरंतर सक्रिय होना चाहिए। इस कविता का मुख्य उद्देश्य ये है कि जीवन अमूल्य है इसलिए मनुष्य को आलस और मोह को त्याग कर अपने कर्म, चेतना और नवजीवन की ओर अग्रसर होना चाहिए।
सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ जी द्वारा लिखित कविता “जागो फिर एक बार” जैसी और कविताओं को पढ़ने के लिए हमारे स्पेशल कैटेगरी सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ को देखे। अगर आप हमारे द्वारा लिखे गए इस तरह के आर्टिकल्स में सहयोग देना चाहते है तो हमारे व्हाट्सएप चैनल को ज्वाइन कर के हमारे साथ जुड़िए। किसी भी प्रकार के सहयोग, प्रश्न अथवा सुझाव के लिए हमारे साथ व्हाट्सएप चैनल के माध्यम से हमसे जुड़े। धन्यवाद!
