स्नेह निझिर बह गया है
सूर्यकांत त्रिपाठी “निराला”
स्नेह-निर्झर बह गया है !
रेत ज्यों तन रह गया है ।
आम की यह डाल जो सूखी दिखी,
कह रही है-“अब यहाँ पिक या शिखी
नहीं आते; पंक्ति मैं वह हूँ लिखी
नहीं जिसका अर्थ-
जीवन दह गया है।”
“दिये हैं मैने जगत को फूल-फल,
किया है अपनी प्रतिभा से चकित-चल;
पर अनश्वर था सकल पल्लवित पल-
ठाट जीवन का वही
जो ढह गया है ।”
अब नहीं आती पुलिन पर प्रियतमा,
श्याम तृण पर बैठने को निरुपमा ।
बह रही है हृदय पर केवल अमा;
मै अलक्षित हूँ; यही
कवि कह गया है।

“स्नेह-निर्झर बह गया” कविता का सारांश:-
“सूर्यकांत त्रिपाठी” द्वारा रचित कविता “स्नेह-निर्झर बह गया” कविता एक अत्यंत मार्मिक और भावपूर्ण कविता है। “स्नेह निझिर बह गया है” कविता के माध्यम से कवि में अपने जीवन के अकेलेपन, दुख, उपेक्षा और निराशा को अत्यंत सरलता और भावपूर्ण ढंग से व्यक्त किया है। कवि का यह मानना है कि जीवन में प्रेम, अपनापन और उत्साह खत्म हो जाने पर व्यक्ति अंदर से सूख जाता है। कवि इस कविया में अपनी तुलना एक ऐसे वृद्ध से करता है जिसमें नाही हरियाली बची है और न ही जीवन जीने की उल्लास बची है।
कवि शुरुआत में कहता है कि उसके जीवन का प्रेम भावनाओं का झरना बन चुका है। अब कवि का शरीर रेत की भाती सुख और निस्सार बन चुका है। यहां कवि अपने मानसिक और भावनात्मक खालीपन को व्यक्त करते हुए कहते है कि जिस प्रकार नदी का पानी सुख जाता है और अंत में केवल रेत बचती है, ठीक उसी प्रकार जीवन भी सुना हो गया है।
इसके बाद कवि आम की सूखी डाल का उदाहरण देते हैं। वह डाल मानो कह रही हो कि अब यह कोयल और मोर नहीं आते है और इसका अर्थ यह है कि जहां पहले सौंदर्य, जीवन और आनंद था अब वहाँ वीरानी छा गई है। कवि स्वयं को एक ऐसी निरर्थक पंक्ति मानता है जिसका कोई अर्थ नहीं है और जिसके जीवन का उत्साह समाप्त हो चुकी है। “जीवन दह गया है” पंक्ति से कवि अपने अंदर की पीड़ा और जलन को व्यक्त करता है।
कविता “स्नेह निझिर बह गया है” के अगले भाग में कवि अपने पुराने गौरव और अपनी उपलब्धियों को याद करता है और कहता है उन्होंने ने संसार को फूल और फल दिए अर्थात वह कहते है कि उन्होंने अपने रचनाओं और प्रतिभा से संसार को बहुत कुछ दिया हैं। उन्होंने अपनी कला से समाज को आश्चर्यचकित किया है लेकिन जीवन का वह सुंदर वैभव स्थायी नहीं था। समय के साथ सब कुछ नष्ट हो गया। “स्नेह निझिर बह गया है” कविता में कवि यह बताना चाहते है कि संसार का कोई भी सुख, यश, वैभव हमेशा नहीं रहता।
कविता “स्नेह निझिर बह गया है” के अंतिम भाग में कवि अपने गहरे अकेलेपन के बारे में कहते है। कवि कहते है कि अब उनकी प्रिय भी अब उनके साथ आंधी के निकारे आकर नहीं बैठती है। कवि के हृदय में केवल उदासी और अंधकार रह गया है। कवि स्वयं को अनदेखा महसूस करते है। कवि कहते है कि समझ उनके भावनाओं और अस्तित्व को नहीं समझता है। कविता “स्नेह निझिर बह गया है” के अंत ने कवि यही संदेश देते है कि जीवन प्रेम और अपनापन खत्म हो जाने पर मनुष्य अंदर से टूट जाता है और यह अकेलापन उसे निराशा की ओर लेके जाता है।
इस प्रकार यह कविता कवि के व्यक्तिगत दुख, भावनात्मक शून्यता आदि को दर्शाता है।
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