गा की वर्षा पावक कण
सुमित्रानंदन पंथ
गा, कोकिल, बरसा पावक-कण!
नष्ट-भ्रष्ट हो जीर्ण-पुरातन, ध्वंस-भ्रंस जग के जड़ बन्धन !
पावक-पग धर आवे नूतन,
हो पल्लवित नवल मानवपन !
गा, कोकिल, भर स्वर में कम्पन!
झरें जाति-कुल-वर्ण-पर्ण घन,
अन्ध-नीड़-से रूढ़ि-रीति छन,
व्यक्ति-राष्ट्र-गत राग-द्वेष रण,
झरें, मरें विस्मृति में तत्क्षण!
गा, कोकिल, गा, कर मत चिन्तन !
नवल रुधिर से भर पल्लव-तन,
नवल स्नेह-सौरभ से यौवन,
कर मंजरित नव्य जग-जीवन,
गूँज उठें पी-पी मधु सब-जन !
गा, कोकिल, नव गान कर सृजन !
रच मानव के हित नूतन मन
, वाणी, वेश, भाव नव शोभन,
स्नेह, सुहृदता हो मानस-घन,
करें मनुज नव जीवन-यापन!
गा, कोकिल, संदेश सनातन !
मानव दिव्य स्फुलिंग चिरन्तन,
वह न देह का नश्वर रज-कण !
देश-काल हैं उसे न बन्धन,
मानव का परिचय मानवपन !
कोकिल, गा, मुकुलित हों दिशि-क्षण !
कविता का सारांश:
सुमित्रानंदन पंत द्वारा रचित कविता “गा की वर्षा पावक कण”का उद्देश्य मानव समाज में नवजागरण, परिवर्तन और मानवता के उत्कर्ष का संदेख देना है। ये एक अत्यंत प्रेरणादायक कविता है। कवि कोयल से वार्ता करते हुए उससे एक ऐसा मधुर और ओजस्वी गीत गाने का निवेदन करते है, जो जो समझ में फैली रूढ़ियों और कुप्रथाओं को नष्ट कर दे। कवि ये चाहते है कि कोयल के गीतों की वर्षा से सारी व्यर्थ कुप्रथाओं और रूढ़ियों का अंत हो जाए तथा एक नवीन, प्रगतिशील और मानवीय समाज का निर्माण किया जा सके।
सुमित्रानंदन पंत द्वारा रचित कविता “गा की वर्षा पावक कण” में कवि के अनुसार जाति, कुल, वर्ण, रंग, ऊंच – नीच तथा रूढ़िग्रस्त सभी भेदभावों का जन्म मानव सभ्यता तथा उसके विकास के लिए सबसे बड़ी बाधा है। मानव के हृदय में केवल प्रेम, स्नेह और सद्भावना की सुगंध फैलानी चाहिए। समस्त मानव जाति आनंद और मधुरता से परिपूर्ण होकर जीवन व्यतीत करे। इसके कारण ये अनिवार्य है कि मनुष्य के विचार, वाणी, वेशभूषा और भावनाओं में भी नवीना और श्रेष्ठता का समावेश हो। स्नेह, मित्रता और सहृदयता मानव जीवन के मूल्य बने।
सुमित्रानंदन पंत द्वारा रचित कविता “गा की वर्षा पावक कण” के अंत में कवि कहते है कि मनुष्य केवल नश्वर शरीर का ही नहीं अपितु दिव्य और चिरंतन चेतना का भी प्रतिबिंब है। देश, कल और परिस्थितियों के कारण उसकी वास्तविक स्वरूर में परिवर्तन नहीं हो सकता। मनुष्य की वास्तविक पहचान उसकी मनुष्यता है अर्थात् उसके अंदर का स्नेह, प्रेम और करुणा। इस कारण कवि कोयल से पुनः ये आग्रह करते है कि वो ऐसे गीत गए जो सभी दिशाओं में नवजीवन, नवचेतन और मानवता का संदेख पहुंचाए।
यह कविता मानवता, सामान्य, नवजागरण, प्रेम और प्रगतिशील परिवर्ता का संदेख देती है।
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