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गहन है या अंधकार सूर्यकांत त्रिपाठी “निराला गहन है यह अंधकारा; स्वार्थ के अवगुंठनों से हुआ है लुंठन हमारा। …

कर्मवीर अयोध्यासिंह उपाध्याय हरिऔध देख कर बाधा विविध, बहु विघ्न घबराते नहीं रह भरोसे भाग्य के दुख भोग पछताते नहीं…