हीन भए जल मीन अधीन ( घनानंद के पद )
कवि परिचय :
घनानंद जी रीतिकाल की रीतिमुक्त काव्य धारा के प्रमुख कवि थे। इनका जन्म 1689 ई० में हुआ। जनश्रुति के अनुसार घनानंद दिल्ली के बादशाह मुहम्मद शाह रंगीला के दरबार में मीर मुंशी थे। उनके काव्य की प्रमुख भावना ‘उन्मुक्त प्रेम’ है। यह प्रेम लौकिकता से अलौकिकता की ओर मुखरित है। वे प्रधानतः विप्रलम्भ श्रृंगार के कवि है किन्तु श्रृंगार के दोनों-संयोग और वियोग पक्ष उनके काव्य में चित्रित हुए हैं। उनकी सभी रचनाओं में ‘सुजान’ को सम्बोधित किया गया है जिसे श्रृंगार में नायक के लिए तथा भक्तिभाव में कृष्ण के लिए प्रयुक्त समझना चाहिए।
घनानंद की भक्ति भावना की बात की जाए तो वे लौकिक प्रेम के माध्यम से अलौकिक प्रेम की अभिव्यञ्जना करते हैं। वियोगी हरि कहते हैं, ‘घनानंद को बाल्यकाल से ही रासलीला देखने का शौक था। रासलीला मण्डलियों को वे अपने खर्चे पर बुलवाकर रास कराया करते थे और कभी-कभी स्वयं भी रास मण्डली में भाग लेते थे। यही प्रवृत्ति उन्हें वृंदावन में रमण रेती तक ले गई।’
कुछ ऐसा ही शंभुप्रसाद बहुगुणा कहते हैं, ‘घनानंद चाहे कृष्ण के तथा राधा के सगुण रूप का, उनकी कृपा का, उनकी लीलाओं का सजीव और प्राणों को प्रसन्न करनेवाला गुणगान करते हैं, परंतु प्रधानता उनमें उस विरह भावना की मर्मस्पर्शी विकलता की है, जो जायसी, इमामशाह, कबीर, मीरा, दादू, नानक, बाबा लालदास आदि प्रेमभोगी संतों में पाई जाती है।’
घनानंद के काव्य के प्रति हम आचार्य नगेन्द्र के विचार को ही दुहराएँगे, ‘कवि ने काव्य के प्रति अत्यन्त स्पष्ट शब्दों में आत्मपरक दृष्टिकोण की प्रतिष्ठा की और जीवन तथा काव्य में रीति रूढ़ियों का तिरस्कार कर स्वच्छंद मार्ग ग्रहण किया। कविता के लिए सायास शिल्प विधान का कोई महत्त्व नहीं है, यह आवेश-प्रेम के आवेग का सहज उच्छलन है। घनानंद के काव्य का मुख्य विषय प्रेम या शृंगार ही है किंतु यह स्वच्छंद है, जो एक ओर प्रेम की सांप्रदायिकता से मुक्त है तो दूसरी ओर समाज के रीति-नियमों से।’
उनकी प्रमुख रचनाएँ निम्नलिखित हैं – सुजान सागर, विरह लीला, सुजानहिति, प्रेम सरोवर, प्रीति पावस आदि। उनकी कविता में प्रेम का सहज, सरल एवं स्वच्छंद रूप दिखाई पड़ता है। उनका काव्य ब्रजभाषा में रचित है जिसमें भाव व रस का उत्कर्ष दिखाई पड़ता है। उनका काव्य कवित्त और सवैया छंदों में रचित हैं। विरोधाभास उनकी शैली का विशिष्ट गुण है। घनानंद की मृत्यु 1739 ई० में हुई।
हीन भए जल मीन अधीन कहा कछु मो अकुलानि समानै ।
( पस्तुत पंक्ति ‘हीन भए जल मीन अधीन’ घनानंद जी द्वारा रचित है, जिसका अर्थ है:- जिस प्रकार जल बिना मीन अर्थात् मछली तड़पती है, मेरी व्याकुलता उसे अधिक है। )
नीरसनेही कों लाय कलंक, निरास है कायर त्यागत प्रानै ।।
( पस्तुत पंक्ति ‘हीन भए जल मीन अधीन’ घनानंद जी द्वारा रचित है, जिसका अर्थ है:- जिसका प्रेम सच्चा नहीं होता केवल आडंबर होता है वह ही प्रेम पर दोष लगता है; निराश हो कर अंत में प्राण त्याग देना कायरता है। )
प्रीति की रीति सु क्यों समुझैं जड़, मीत के पानि परे को प्रमानै।
( पस्तुत पंक्ति ‘हीन भए जल मीन अधीन’ घनानंद जी द्वारा रचित है, जिसका अर्थ है:- मूर्ख लोग प्रेम की रीति को कैसे समझेंगे। वे तो केवल बहती बातों को ही प्रमाण मानते है। )
या मन की जु दसा घनआनँद जीव की जीवनि जान ही जानै।।
( पस्तुत पंक्ति ‘हीन भए जल मीन अधीन’ घनानंद जी द्वारा रचित है, जिसका अर्थ है:- मेरी इस मन की जो अवस्था है उससे सिर्फ वो ही व्यक्ति समझ सकता है जिसने कभी प्रेम को अनुभव किया है। )
संदर्भ :-
प्रस्तुत पघांश कवि घनानन्द द्वारा रचित कविता है।
प्रसंग :-
प्रस्तुत पघांश मे कवि का यह कथन है कि प्रेम की सत्यता वह है, जहाँ प्रेमी के वियोग की पीड़ा और वेदना को सहे उससे बचने का मार्ग न ढुँढ़े।
व्याख्या :-
‘हीन भए जल मीन अधीन’ पद में कवि कहते है कि मछली जल के अधीन रहती है, वह उससे भलग होकर तड़पने लगती है और मर जाती है। मछली जल के वियोग मे तड़पकर मर जाने से वह अपने निष्दूर प्रिय ( जल )पर कलंक लगा देती है। अदिश प्रेमी तो वह है जो प्रिय की वेदना को सहे। तड़पने और प्राण देने वाले प्रेम की रीति को क्या समझेंगे ? वे तो प्राण त्यागकर अपने प्रिय पर लाछँन लगा देते है। वे अपने प्रिय के बिना नहीं जी सकते, यह उनके मर जाने से सिह नहीं होता है। घनानन्द जी कहते है कि मेरे मन की दशा और जीवन की स्थिति सुजान ही जान सकती है।
- ‘पानी परे’ एक मुहावरा है, जिसका अर्थ होता है – अधीन होना।
- जान (सुजान) और जाने दोनों क्रमश: कर्ता व क्रिया है जो एक ही शब्द से बने है। अतः यह व्यग्य चमत्कार है।
घनानंद द्वारा लिखित “हीन भए जल मीन अधीन” पद मे प्रेम की विरह वेदना को अत्यंत भावनाओ को गहराई से व्यक्त किया गया है। इस पद के माध्यम से कवि ये स्पष्ठ उदेश देना चाहते है की प्रेम में प्राण त्याग देना ही रीत नहीं है, बल्कि कष्ट सहते हुए भी अपने प्रिय के प्रति अडिग प्रेम बनाए रखना ही सच्चा प्रेम है।
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