अमृत संदेश
ऐ भावी सुधारकों, ऐ भावी देशभक्तों ! तुमलोग हृदयवान बनो, प्रेमी बनो। क्या तुमलोग अपने प्राणों में यह अनुभव कर रहे हो कि देवताओं और ऋषियों की करोड़ों सन्तानें पशु समान हो गयी हैं ? क्या तुमलोग हृदय से यह अनुभव कर रहे हो – कोटि कोटि लोग अनाहार से मर रहे हैं, कोटि कोटि लोग शताब्दियों से आधा पेट खाकर जीवन बिता रहे हैं ?
क्या तुमलोग यह सब सोचकर बेचैन हुए हो ? उस चिन्ता ने क्या तुमलोगों को पागल बना दिया है ? क्या देश की दुर्दशा की चिन्ता तुम्हारे ध्यान का एकमात्र विषय हुई है एवं उस चिन्ता में डूब कर क्या तुमलोग नाम यश, स्त्री-पुत्र, विषय सम्पत्ति, यहाँ तक कि शरीर को भी भूल गये हो ? क्या तुमलोगों की ऐसी अवस्था हुई है ? यदि हाँ, तो जानना देशभक्त होने की पहली सीढ़ी पर अभी तुमने केवल कदम ही रखा है।
देशप्रेमी बनो – जिस जाति ने पहले हमलोगों के लिए इतने बड़े बड़े कार्य किये हैं, उस जाति को हृदय से प्यार करो। …. हमलोगों की इस परम पवित्र मातृभूमि की अत्यन्त प्राचीन सभी रीतिरिवाजों की भी जरा भी निन्दा मत करो, अत्यन्त कुसंस्कारपूर्ण और युक्तिहीन प्रथाओं के विरूद्ध भी एक भी निन्दापूर्ण वाक्य मत बोलो क्योंकि उनके द्वारा भी पहले हमलोगों का कुछ न कुछ कल्याण अवश्य हुआ है। अरे, धर्म कर्म करने के लिए पहले कूर्मावतार की पूजा चाहिए और पेट है वही कूर्म।
पहले इसे ठंडा किये बिना तुम्हारे धर्म कर्म की बात कोई ग्रहण नहीं करेगा। देखता नहीं, पेट की ही चिन्ता में भारत परेशान है। …. धर्म की बात सुनाने के लिए पहले इस देश के लोगों की पेट की चिन्ता दूर करनी होगी। अन्यथा केवल लेक्चर फेक्चर से कोई विशेष फल नहीं होगा।
पहले देश के लोगों को अन्न उपार्जन का उपाय सिखा दो। तत्पश्चात् भागवत पढ़ कर सुनाना। कर्मठता के द्वारा ऐहिक अभाव दूर किये बिना धर्म की बातों पर कोई ध्यान नहीं देगा। इसीलिए कहता हूँ- पहले स्वयं के भीतर की अन्तर्निहित आत्मशक्ति को जागृत करो, तत्पश्चात् देश के साधारण जन के भीतर जितना संभव हो, उस शक्ति से विश्वास जागृत कर पहले अन्न उपार्जन तथा बाद में धर्म प्राप्ति की बात सिखाना। जनसाधारण को शिक्षित करना तथा उनकी उन्नति करना ही राष्ट्रीय जीवन गठन का उपाय है।
हमारे समाज सुधारक खोज नहीं पाते कि नासूर कहाँ है ?….. इसमें हमारे धर्म का कोई दोष नहीं, क्योंकि मूर्तिपूजा से विशेष कुछ आता जाता नहीं। सारी त्रुटियों की जड़ यही है कि जो यथार्थ राष्ट्र है – जो कुटियों में निवास करता है, वह अपना व्यक्तित्व और मनुष्यत्व भूल गया है। .. उनका खोया हुआ व्यक्तित्व बोध उन्हें पुनः लौटा देना होना। उन्हें शिक्षित करना होगा।
जितने दिनों तक भारत के बीस करोड़ लोग भूखे पशुओं के समान रहेंगे तब तक ये सब बड़े लोग जो उनका शोषण कर धनवान बनकर तड़क – भड़क से मौज कर रहे हैं लेकिन उनके लिए कुछ भी नहीं कर रहे, मैं उन्हें भाग्यहीन दुष्ट कहूँगा। हे भाइयों ! हमलोग गरीब हैं, नगण्य जरूर हैं, लेकिन हमारे समान गरीब लोग ही चिरकाल से उस परमपुरुष के यंत्रस्वरूप होकर कार्य करते रहे हैं।
भारत क्या बुद्धिवृत्रिहीन है ? क्या कलाकौशलशून्य है ? उसके शिल्प, उसके गणित, उसके दर्शन को देखकर क्या हम उसे किसी विषय में तुच्छ कह सकते हैं ? केवल यही जरूरत है कि उसे मोहनिद्रा से शतशत शताब्दियों की दीर्घ निद्रा से – जागना होगा एवं पृथ्वी की सारी जातियों में उसे अपना यथार्थ स्थान ग्रहण करना होगा।
एक नया भारत निकल पड़े निकले हल पकड़कर किसानों की झोपड़ी भेदकर, मछुआ, मोची, मेहतरों की झोपड़ियों से। निकल पड़े बनियों की दुकानों से, भुजवा के भाड़ से, कारखानों से, हाट से, बाजार से। निकले झाड़ियों, जंगलों, पहाड़ों, और पर्वतों से। इनलोगों ने सहस्रों वर्षों से अत्याचार सहा है, चुपचाप सहा है उससे पायी है, अपूर्व सहिष्णुता । सदियों से दुःख भोग किया है -उससे पायी है, अटल जीवनीशक्ति। ये लोग एक मुट्ठी सत्तू खाकर दुनिया को उलट सकते हैं।
आधा पेट रोटी पाने से त्रैलोक्य उनके तेज को नहीं धारण कर सकता, ये रक्तबीज की शक्ति से सम्पन्न हैं और इन्होंने पाया है, ऐसा अद्भुत सदाचार बल जो त्रैलोक्य में नहीं। इनमें इतनी शांति, इतनी प्रीति, इतना प्रेम ! ये लोग मुँह बंदकर चुपचाप दिनरात अनवरत परिश्रम करते हैं, तथा कार्य के समय इनमें सिंह जैसा विक्रम !! अतीत के कंकालस्वरूप ! ये ही तुम्हारे सामने उत्तराधिकारी हैं भविष्यत् भारत।
विश्वास, विश्वास, विश्वास – अपने आप पर विश्वास – ईश्वर पर विश्वास यही उन्नतिप्राप्ति का एकमात्र उपाय है। यदि तुम्हारा अपने देश के पुराणों के तैंतीस करोड़ देवताओं और विदेशियों के द्वारा लाये गये सभी देवताओं पर विश्वास हो, लेकिन यदि तुम्हारा अपने आप पर विश्वास न हो तो तुम्हारी कभी मुक्ति नहीं होगी। अपने आप पर विश्वास रखो – उसी विश्वास के बल पर अपने पैरों पर खड़े होओ एवं वीर्यवान बनो।
अपने ऊपर विश्वास रखो प्रबल विश्वास ही बड़े-बड़े कार्यों का जनक है। आगे बढ़ो, आगे बढ़ो ! मृत्युपर्यन्त गरीबों और पददलितों के प्रति सहानुभूति रखनी होगी – यही हमारा मूलमंत्र है। आगे बढ़ो, वीर हृदय युवकगण !
मैं चाहता हूँ – यही श्रद्धा। हमलोगों में से प्रत्येक को चाहिए यही आत्मविश्वास। … हमारे जातीय रुधिर में एक भयानक रोग का कीटाणु प्रवेश कर गया है – सारी चीजों को हँस कर उड़ा देना, गाम्भीर्य का अभाव। इस दोष को सम्पूर्ण रूप से त्याग करना होगा। वीर बनो, श्रद्धावान बनो। फिर जो कुछ है सब स्वयमेव ही आ जायेगा। साहस का अवलम्बन करो, डरो मत !.. हमलोगों को ‘अभीः निर्भीक बनना होगा, तभी हम अपने कार्यों में सिद्धिलाभ कर सकेंगे। उठो-जागो, क्योंकि तुम्हारी मातृभूमि इसी महाबलि की तुमसे माँग कर रही है।
साहस का अवलम्बन करो। विश्वास करो हमलोग ही महत् कार्य कर सकेंगे, हम गरीब लोग जिनसे लोग घृणा करते हैं लेकिन जिन्होंने ही लोगों के दुख को सचमुच अपने हृदय में अनुभव किया है। राजा महाराजाओं के द्वारा महत् कार्य होने की आशा बहुत कम है।
गणमान्य, उच्चपदस्थ तथा धनी लोगों पर कोई भरोसा मत करो। उनमें जीवनी शक्ति नहीं भरोसा तो तुम्हीं लोगों पर है जो पदमर्यादाहीन, दरिद्र लेकिन विश्वासी – ऐसे तुमलोगों पर ! भगवान पर विश्वास रखो। किसी चालाकी की आवश्यकता नहीं, चालाकी के द्वारा कुछ भी नहीं होता। दुखियों की व्यथा का अनुभव करो और भगवान से सहायता की प्रार्थना करो।
तुमलोग सब कर सकते हो, यही विश्वास रखो। यह मत सोचो कि तुमलोग दुर्बल हो। … दूसरों की सहायता के बिना भी तुमलोग सब कुछ कर सकते हो। सारी शक्ति तुम्हीं लोगों में है, उठ खड़े होओ। तुम्हारे भीतर जो देवत्व सुप्त है उसे प्रकाशित करो। स्वयं पर विश्वास किये बिना ईश्वर पर विश्वास नहीं होता।
मनुष्य चाहिए-मनुष्य, और सब स्वयं हो जायेगा। वीर्यवान, सम्पूर्ण निष्कपट, तेजस्वी एवं विश्वासी युवकों की आवश्यकता है। इस प्रकार के सौ युवकों के होने से समग्र जगत की भावधारा को मोड़ दिया जा सकता है। आओ मनुष्य बनो। अपनी संकीर्णता के गर्त से बाहर निकल कर देखो – सारी जातियाँ कैसी उन्नति के पथ पर चल रही हैं। तुमलोग क्या मनुष्य से प्रेम करते हो ? तुम लोग क्या देश से प्रेम करते हो? तब फिर आओ हमलोग नेक बनने के लिए, उन्नत होने के लिए प्राणपण से चेष्टा करें।… पीछे मुड़ कर मत देखो, आगे बढ़ो। अन्ततः भारत माता सहस्रों युवकों की बलि चाहती हैं। याद रखो – मनुष्य चाहिए पशु नहीं।
हमारे देश के लिए आज आवश्यकता है- लोहे के समान दृढ़ मांसपेशी और इस्पात के समान स्नायुओं की, ऐसी दृढ़ इच्छा शक्ति की, जिसका प्रतिरोध करने में कोई भी समर्थ न हो, जो ब्रह्मांड के समस्त रहस्यों को भेदने में समर्थ हो भले इस कार्य को करने के लिए समुद्र की तलहटी में भी जाना पड़े या सर्वदा सर्वप्रकार से मृत्यु का आलिंगन करने के भी लिए प्रस्तुत रहना पड़े। आज हमें इसी बात की आवश्यकता है।
हम लोगों को आज आवश्यकता है – शक्ति संचार की। हम दुर्बल हो गये हैं।. तुमलोग अपने स्नायु सशक्त करो। हमें जरूरत है – लोहे के समान मांसपेशियों की और वज्र के समान स्नायुओं की। बहुत दिनों तक हम रो चुके, अब और रोने की जरूरत नहीं, अब अपने पैरों पर उठ खड़े होओ एवं मनुष्य बनो।
हमें चाहिए पूर्ण सरलता, पवित्रता, विराट बुद्धि तथा सर्वजयी इच्छा शक्ति ! इन सब गुणों से सम्पन्न मुट्ठीभर लोग यदि काम में लग जायें तो सारी दुनिया उलट पुलट हो जाये।… चरित्र गठन के लिए केवल धीर और अविचलित प्रयास, तथा सत्य की उपलब्धि करने की तीव्र चेष्टा ही एकमात्र मानवजाति के भविष्य के जीवन पर छाप छोड़ सकती है।
दुर्बल मस्तिष्क कुछ नहीं कर सकता मस्तिष्क सबल बनाना होगा- हमारे युवकों को पहले सबल बनना होगा, उससे बाद है धर्म। हे मेरे युवक मित्रों ! तुम शक्तिमान बनो – तुम्हारे लिए मेरा यही संदेश है। गीता पाठ की अपेक्षा फुटबाल खेलने से तुम स्वर्ग के और भी समीप पहुँचोगें।
तुमलोग हजारों समितियाँ गठित कर सकते हो, बीस हजार राजनीतिक सम्मेलन कर सकते हो, पचास हजार स्कूल खोल सकते हो – लेकिन इन सब का कोई फल नहीं होगा, जब तक तुम्हारे भीतर वह सहानुभूति, वह प्रेम का आविर्भाव नहीं होगा, जबतक तुम्हारे भीतर वह हृदय जागृत नहीं होगा, जो सबके सुख दुःख को अनुभव कर सके।
… यही परानुवाद, परानुकरण, परमुखापेक्षा यही दाससुलभ दुर्बलता, यही घृणित जघन्य निष्ठुरता – इन्हीं सम्बलों से तुम उत्तराधिकार लाभ करोगे? इस लञ्जाजनक कापुरुषता की सहायता से तुम वीरभोग्या, स्वाधीनता प्राप्त करोगे? मत भूलो कि तुम्हारा विवाह, तुम्हारा धन, तुम्हारा जीवन इन्द्रियसुख, अपने व्यक्तिगत सुख के लिए नहीं है। मत भूलो कि तुम जन्म से ही ‘माँ’ के लिए बलिस्वरूप रखे गये हो, मत भूलो कि -तुम्हारा समाज विराट महामाया की छायामात्र है, मत भूलो कि – नीच जाति, मूर्ख, दरिद्र, अज्ञानी, मोची, मेहतर तुम्हारे रक्त हैं, तुम्हारे भाई हैं।
यह मत सोचो कि तुम दरिद्र हो, मत सोचो कि तुम बंधुहीन हो। क्या किसी ने देखा है कि रुपया – मनुष्य तैयार करता है ? मनुष्य ही हमेशा से रुपया पैदा करता रहा है। जंगत की जो कुछ भी उन्नति है, सबकुछ मनुष्य की शक्ति से हुई है, उत्साह की शक्ति से हुई है, विश्वास की शक्ति से हुई है।
जागो, जागो, दीर्घ रजनी बीतने को है। दिन का प्रकाश दिखाई दे रहा है। महान तरंग उठ रही है। कोई भी इसकी गति को रोक नहीं सकेगा.. विश्वास, श्रद्धा। अब डरो मत, सबसे बड़ा पाप है – भय !
उठो जागो, जबतक लक्ष्य तक न पहुँच जाओ, तबतक निश्चिन्त मत बैठो, उठो, फिर से एकबार उठो, बिना त्याग के कुछ नहीं हो सकता। यदि दूसरों की सहायता करना चाहते हो तो तुम्हें अपने ‘अहं’ का त्याग करना होगा। वैराग्यवान बनो…। अपने इस क्षुद्र जीवन को विसर्जित करने को तैयार हो जाओ। उठो, जागो, यह क्षुद्र जीवन अगर नष्ट भी हो जाता है तो हर्ज क्या है? सभी मरेंगे – साधु, असाधु, धनी, दरिद्र सभी मरेंगे। किसी का भी शरीर चिरकाल तक नहीं रहेगा। अतः उठो, जागो एवं सम्पूर्ण रूप से निष्कपट बनो।
कार्य का साधारण आरम्भ देखकर हतोत्साहित मत होओ, सामान्य गति से ही कार्य बड़ा हो जाता है। साहस का अवलम्बन करो। नेता बनने की कोशिश मत करो, सेवा करो। नेतृत्व की इस पाशविक प्रवृत्ति ने ही जीवन समुद्र में बड़े बड़े जहाज डुबो दिये हैं। इस बारे में विशेष सतर्क रहो अर्थात् मृत्यु की परवाह न कर निःस्वार्थ हो जाओ और कार्य करो।
… आशिष्ठ, द्रढ़िष्ठ, बलिष्ठ (शिष्टवान, दृढ़, शक्तिशाली) तथा मेधावी, युवकों के द्वारा ही यह कार्य सम्पन्न होगा। इसप्रकार के हजारों नवयुवक हैं। उठो, जागो, विश्व तुम्हें पुकार रहा है। अन्यान्य जगहों में बुद्धिबल है, धनबल है, लेकिन केवल हमारी मातृभूमि में ही उत्साह की ज्वाला विद्यमान है। इस उत्साहाग्नि को प्रज्वलित करना होगा। अतएव हे … युवकगण !
हृदय में इस उत्साह की अग्नि को जलाकर जागो। नाम, यश भाड़ में जाय। काम में लग जाओ, साहसी युवकवृन्द, कार्य में लगो। जितना आलस्य है उसे दूर कर दो, दूर कर दो इहलोक और परलोक की भोग वासना। अग्नि में छलांग लगा दो। मेरे भीतर जो अग्नि जल रही है, वह तुम्हारे भीतर भी जल उठे, तुम्हारा मन मुख एक हो -करनी और कथनी में जरा भी भेद न होने पाये।
तुमलोग जगत के युद्धक्षेत्र में वीरों की तरह मर सको … यही सदैव विवेकानन्द की प्रार्थना है।
जगत् में आज नितान्त आवश्यकता है चरित्र की। आज जगत उन्हें चाहता है जिनका जीवन प्रेमपूर्ण और स्वार्थशून्य हो।
रुपये से कुछ नहीं होता, नाम से भी नहीं होता, यश से भी नहीं होता। विद्वत्ता से भी कुछ नहीं होता, प्रेम से सब होता है चरित्र ही बाधाविघ्न के वज्रवत प्राचीर के बीच से पथ बना लेता है।
चरित्र चाहिए, चाहिए ऐसी दृढ़ता और चरित्रबल जिससे मनुष्य किसी एक भाव को दृढ़ता से मृत्यु पर्यन्त पकड़े रहे।
परनिन्दा बिल्कुल दूर कर दो। तुम्हारा मुँह बन्द रहे, हृदय खुल जाये। इस देश तथा सारे जगत का उद्धार करो। तुममें से प्रत्येक को ही सोचना पड़ेगा कि समस्त भार तुम्हारे ही ऊपर है।
मैं तुमलोगों से कहता हूँ, हमें आवश्यकता है शक्ति, शक्ति, केवल शक्ति की। और उपनिषद् समूह शक्ति का वृहद् भंडार है। उपनिषद् जो शक्ति संचार करने में समर्थ है, वही शक्ति समस्त जगत् को तेजस्वी बना सकती है। उसके द्वारा सम्पूर्ण जगत को पुनरूज्जीवित, शक्तिमान और वीर्यशाली करना होगा। उपनिषद् सभी जातियों सभी मतों, सभी सम्प्रदायों के दुर्बल दुःखी पददलितों का उच्चस्वर से आह्वान करके उन्हें अपने पैरों पर खड़े होकर मुक्त होने को कहता है।
अभिशाप, निन्दा और गालियों के द्वारा कोई सत् उद्देश्य सम्पन्न नहीं होता। कई वर्षों से तो ऐसा ही होता रहा है लेकिन उससे कोई लाभनहीं हुआ। केवल प्रेम और सहानुभूति के द्वारा ही सफलता प्राप्ति की आशा की जा सकती है।
प्रत्येक व्यक्ति को चाहिए कि वह दूसरे व्यक्ति को… ईश्वर के रूप में देखे और उसके साथ वैसा ही व्यवहार करे। किसी से घृणा करना या किसी प्रकार किसी की निन्दा या अनिष्ट करना उचित नहीं। और यह केवल संन्यासी का ही कर्तव्य है, ऐसा नहीं, सभी नर-नारियों का कर्तव्य है।
आज हो, या कल हो, या सैकड़ों युगों के बाद हो, सत्य की जय अवश्य होगी। प्रेम की जय अवश्य होगी। तुमलोग क्या मनुष्य से प्रेम करते हो? ईश्वर को खोजने कहाँ जा रहे हो? गरीब, दुखी, दुर्बल ये सभी लोग क्या तुम्हारे ईश्वर नहीं? पहले उनकी उपासना क्यों नहीं करते? … क्या तुम्हारे हृदय में प्रेम है? तब तो तुम सर्वशक्तिमान हो। क्या तुम पूर्णतया निष्काम हो? यदि हो तो तुम्हारी शक्ति को कौन रोक सकता है? चरित्रबल से मनुष्य सर्वत्र ही जयी होता है।
सत्य के लिए सब कुछ का त्याग किया जा सकता है लेकिन किसी भी चीज के लिए सत्य का त्याग नहीं किया जा सकता। सत्य का अनुसंधान अर्थात् शक्ति का प्रकाश – यह दुर्बल या अंधे के समान टटोलने जैसा नहीं है।
त्याग के पथ, शांति के पथ का आश्रय लो अन्यथा मरोगे।… प्राचीन काल में इसी त्याग ने समग्र भारत को विजयी बनाया था, आज भी यही त्याग पुनः भारत को विजयी बनायेगा। यही त्याग आज भी समस्त भारतीय आदर्शों में श्रेष्ठ और गुरूत्वपूर्ण है।
कोई विषय सत्य है या असत्य यह जानने के लिए उसकी एकमात्र परीक्षा यही है, वह तुम्हें शारीरिक, मानसिक या आध्यात्मिक रूप से दुर्बल कर रहा है या नहीं, यदि कर रहा है तो उसका विषवत् त्याग कर दो, उसमें प्राण नहीं, वह कभी भी सत्य नहीं हो सकता। सत्य बलप्रद है, सत्य ही पवित्रता प्रदान करने वाला है, सत्य ही ज्ञानस्वरूप है।
सत्य में प्रतिष्ठित एक भी बात नष्ट नहीं होगी… हो सकता है वह सैकड़ों युगों तक कूड़े के ढेर में दबा रहे, लोगों की आँखों से दूर रहे लेकिन देर सबेर वह आत्मप्रकाश फैलायेगा ही। सत्य अविनाशी है, धर्म अविनाशी है, पवित्रता अविनाशी है। मुझे लगता है देश के जनसाधारण की अवहेलना करना ही हमारा सबसे बड़ा राष्ट्रीय पाप है और वही हमलोगों की अवनति का अन्यतम कारण है।
समष्टि जीवन में व्यष्टि जीवन है, समष्टि के सुख में व्यष्टि का सुख है, समष्टि को छोड़ व्यष्टि का अस्तित्व ही संभव नहीं, यह अनन्त सत्य है, जगत् की मूल भित्ति है।
समाज के आँखों पर बहुत दिनों तक परदा नहीं डाला जा सकता। … सब कुछ सहनेवाली पृथ्वी की तरह समाज ने बहुत सहा है लेकिन एक न एक दिन वह जाग उठेगा एवं उसके श्रीज्ञानालोक से युगयुगान्तर से संचित मलिनता और स्वार्थपरता दूर हो जायेगी।
समाज का नेतृत्व चाहे विद्याबल के द्वारा संचालित हो अथवा बाहुबल के द्वारा या धनबल के द्वारा, उस शक्ति का आधार है – प्रजा की शक्ति। नेतृत्व करनेवाले सम्प्रदाय जितनी मात्रा में इस प्रजाशक्ति से स्वयं को अलग करेंगे वे उतने ही परिमाण में दुर्बल होंगे।
जनसाधारण में शिक्षा का विस्तार करना होगा। दरिद्र व्यक्ति यदि शिक्षा के पास न पहुँच पाये (अर्थात् स्वयं ही शिक्षा लाभ के लिए प्रयत्नशील न हो) तब शिक्षा को ही किसान के हल के पास, मजदूर के कारखाने तथा अन्य सभी जगहों में जाना होगा।
जनसाधारण को प्रचलित भाषा में शिक्षा दो, उन्हें विचार दो, वे कई विषय जानें लेकिन साथ ही साथ कुछ और भी आवश्यक है। उन्हें संस्कृति देने की चेष्टा करो।… जातिभेद का वैषम्य दूर कर समाज में समानता लाने का एकमात्र उपाय है उच्चवर्ण की शक्ति के कारणस्वरूप शिक्षा और संस्कृति को हासिल करना, वह यदि कर सको तो तुमलोग जो चाहते हो, वही पाओगे।
चांडाल के लिए शिक्षा की जितनी आवश्यकता है, ब्राह्मण के लिए उतनी नहीं। यदि ब्राह्मण के लड़के के लिए एक शिक्षक की आवश्यकता है तो चांडाल के लड़के के लिए दस शिक्षक की आवश्यकता है। क्योंकि जिनकी प्रकृति स्वाभाविक रूप से प्रखर नहीं हुई है, उसे अधिक सहायता करनी होगी। तेली के सिर पर तेल लगाना पागल का काम है।
इस समय तुमलोगों का काम है कि देश देश, गाँव गाँव, जाकर लोगों को यह समझा देना कि और आलस्य करके बैठे रहने से काम नहीं चलेगा। शिक्षाहीन, धर्महीन, वर्तमान अवनति की बातें उन्हें समझाकर कहना, भाइयों उठो, जागो और कबतक सोओगे ? सभी को समझाओ कि ब्राह्मण के समान तुमलोगों का भी धर्म में समान अधिकार है। चांडाल तक को इसी अग्नि मंत्र में दीक्षित करो। और सरल ढंग से उन्हें व्यवसाय, वाणिज्य, कृषि आदि गृहस्थ जीवन की अत्यावश्यक विषयों के बारे में उपदेश दो।
इस देश का प्राण धर्म है, भाषा धर्म है, भाव धर्म है और तुम्हारी राजनीति, समाजनीति, दुर्भिक्षग्रस्त को अन्नदान यह सब चिरकाल से इस देश में जैसा हुआ है वैसा ही होगा अर्थात् धर्म के माध्यम से यह सब होता है तो हो अन्यथा तुम्हारा चिल्लाना व्यर्थ होगा।
प्रेम में मनुष्य-मनुष्य में, आर्य-म्लेच्छ में, ब्राह्मण-चांडाल में यहाँ तक कि पुरुष-नारी तक में कोई भेद नहीं रहता। प्रेम समग्र विश्व को अपने गृह सदृश्य कर लेता है। जो सब युवक भारत के निम्नश्रेणी की उन्नति को एकमात्र कर्तव्य मानकर मनप्राण लगा सकते हैं, उनके बीच काम करो, उन्हें जगाओ, संघबद्ध करो एवं इसी त्याग मंत्र में दीक्षित करो।
जो धर्म गरीबों का दुःख दूर नहीं कर सकता, मनुष्य को देवता नहीं बना सकता, वह क्या भला धर्म है? हमलोगों का धर्म क्या है? छुआछूत-केवल मुझे मत छुओ, मुझे मत छुओ। हे हरि ! जिस देश के बड़े बड़े दिग्गज आज दो हजार वर्षों से केवल यह विचार कर रहे हैं दाँये हाथ से खायें कि बायें हाथ से … उनकी अधोगति नहीं होगी तो किसकी होगी ?
जानना पक्षपात ही सभी अनिष्टों का मूल कारण है। अर्थात् यदि तुम किसी के प्रति औरों की अपेक्षा अधिक स्नेह दिखाते हो तो उससे ही भविष्य में विवाद का मूल सूत्रपात होगा। जिस प्रकार शक्ति संचय आवश्यक है उसी प्रकार उसका वितरण भी उसकी अपेक्षा कहीं अधिक आवश्यक है। हृदय में रक्तसंचय अत्यावश्यक है, लेकिन अगर वह शरीर में संचालित न हो तब तो मृत्यु है!
विशेष कुल या विशेष जाति में समाज के कल्याण के लिए विद्या या शक्ति का केन्द्रीभूत होना एक समय के लिए अत्यावश्यक है, लेकिन वही केन्द्रीभूत शक्ति केवल सर्वत्र संचार के लिए ही संचित होना चाहिए। यदि ऐसा न हो पाय तो वह समाज रूपी शरीर निश्चित ही अतिशीघ्र मृत्यु के कराल गाल में समा जायेगा।
घृणा की शक्ति से प्रेम की शक्ति अनन्तगुणी अधिक है।
हे भारत, मत भूलो कि तुम्हारी नारीजाति का आदर्श सीता, सावित्री, दमयन्ती है।
प्राच्य नारी का पाश्चात्य नारी के मापदंड से तुलना करना ठीक नहीं। पाश्चात्य देशों में नारी है स्त्री और प्राच्य में नारी है जननी।
नारी के सारे जीवन में एक ही चिन्तन उसे जागरूक रखता है कि वह माँ है, आदर्श माँ होने के लिए उसे अत्यन्त पवित्र रहना होगा।
भारत के दो महापाप हैं स्त्रियों को पैरों तले रौंदना और जाति जाति करके गरीबों का शोषण करना।
बिना शक्ति के जगत् का उद्धार नहीं होगा। हमारा देश सभी से अधम क्यों है, शक्तिहीन क्यों है ? – शक्ति की अवमानना के कारण।
तुमलोग स्त्रियों की उन्नति कर सकते हो ? तब तो आशा है अन्यथा पशु जन्म नहीं छूटेगा।
स्त्रियों की पूजा करके ही सभी जातियाँ बड़ी हुई हैं। जिस देश, जिस जाति में स्त्रियों की पूजा नहीं होती, वह देश, वह जाति कभी भी बड़ी नहीं हो सकती। किसी भी काल में बड़ी नहीं हो सकती । इसलिए उन्हें ऊपर उठाना होगा।
तुमलोग स्त्रियों को शिक्षा देकर छोड़ दो। उसके बाद वे ही बतायेंगी कि कौन सा उपयुक्त संस्कार उनके लिए आवश्यक है।
मै आशा करती हु की स्वामी विवेकानन्द द्वारा लिखित “अमृत संदेश” से आप सभी को कुछ न कुछ प्रेरणा मिली होगी। विवेकानन्द कहते है कि प्रत्येक व्यक्ति को चाहिए कि वह दूसरे व्यक्ति को… ईश्वर के रूप में देखे और उसके साथ वैसा ही व्यवहार करे। किसी से घृणा करना या किसी प्रकार किसी की निन्दा या अनिष्ट करना उचित नहीं। और यह केवल संन्यासी का ही कर्तव्य है, ऐसा नहीं, सभी नर-नारियों का कर्तव्य है। इस “अमृत संदेश के माध्यम से कवि मानव जीवन से जूरे कई बातों का उल्लेख करते है।
स्वामी विवेकानन्द जी द्वारा रचित “अमृत संदेश” जैसी और रचनाओं को पढ़ने के लिए हमारे स्पेशल कैटेगरी प्रेरणा विवेकानन्द को देखे। अगर आप हमारे द्वारा लिखे गए इस तरह के आर्टिकल्स में सहयोग कोई सहयोग देना चाहते है तो हमारे व्हाट्सएप चैनल को ज्वाइन कर के हमारे साथ जुड़िए।
