मेरी जिंदगी का एक दिन
3 मार्च, 1887, मैं सात साल की होने वाली थी। इसी दिन मेरी टीचर ऐन सुलिवन मेरे घर आई। उस दोपहर, मैं अपने घर के बाहर खड़ी थी, चुपचाप । घर में हो रही हलचल से मुझे लगा, आज कुछ खास होने वाला है। तभी मुझे पास आते कदमों की आहट महसूस हुई। मैंने अपने हाथ आगे बढ़ाए। किसी ने मेरे हाथों को थामा, मुझे उठाया और गले से लगा लिया।
अगली सुबह मेरी टीचर सुलिवन ने मुझे एक गुड़िया दी। मैं कुछ देर उसके साथ खेलती रही, फिर मेरे हाथ पर उन्होंने अपनी उँगली फिराकर doll लिखा। मुझे उँगली के इस खेल में बहुत मज़ा आया। मैं झट उसकी नकल करने लगी। जब मैं सही तरीके से उसे कर पाई तो लगभग दौड़ते हुए मैंने सीढ़ियाँ पार कीं और अपनी माँ के पास पहुँची।
अपनी बाँह आगे कर उस पर doll लिखा। मुझे नहीं मालूम था कि मैंने अभी-अभी जो लिखा है, वह किसी शब्द के हिज्जे हैं। मुझे तो यह भी नहीं मालूम था कि शब्द भी कोई चीज़ होते हैं। मैं तो हाथ पर एक खास तरह से बस उँगली फिरा रही थी। आने वाले दिनों में मैंने इसी तरह कई शब्द सीखे – pin, hat, cup और कई क्रियाएँ भी जैसे- sit, stand, walk आदि। मैंने इन शब्दों को बस लिखना सीखा।
शब्दों के अर्थ भी होते हैं यह तो मैं अपनी टीचर के साथ कई हफ्ते गुज़ारने के बाद ही जान पाई।
एक दिन मैं अपनी नई गुड़िया के साथ खेल रही थी। मिस सुलिवन ने मेरी बड़ी-सी गुड़िया को मेरी गोद में रखा और मेरे हाथ पर लिखा doll।
वे मुझे समझाना चाह रही थीं कि उनके द्वारा मुझे दी गई और मेरी पहली गुड़िया दोनों ही doll हैं। उस दिन सुबह mug और water शब्दों को लेकर मुझे काफी उलझन हुई थी। सुलिवन ने मुझे समझाने की बहुत कोशिश की कि mug और water अलग-अलग शब्द हैं, लेकिन मैं लगातार इसका विरोध करती रही। आखिर तंग आकर उन्होंने बातचीत ही छोड़ दी। उनकी बार-बार की कोशिशों से खीझकर मैंने गुड़िया को ज़ोर से ज़मीन पर पटक दिया। जब उसके चिथड़ों को मैंने अपने पाँवों पर महसूस किया तो मुझे खुशी-सी हुई।
न बुरा लगा, न कोई अफसोस हुआ। मैं जिस अंधेरी दुनिया में जी रही थी वहाँ प्रेम, प्यार की गुंजाइश कम ही थी। मुझे आभास हो चुका था कि मेरी टीचर गुड़िया के बिखरे चिथड़े बुहार रही है। मुझे लगा कि अच्छा हुआ मुझे तकलीफ देने वाली चीज़ का हमेशा के लिए सफाया हो गया। फिर उन्होंने अंदर से टोपी लाकर मुझे पहनाई। मैं समझ गई कि हम बाहर जा रहे हैं। बिना शब्दों वाले इस विचार के दिमाग में आते ही मेरा मन चहक गया।
हम एक कुएँ के पास से गुज़रे। वहाँ आसपास फूलों के बहुत से पौधे थे। उनकी खुशबू हर ओर फैली थी। कोई कुएँ से पानी निकाल रहा था। मेरी टीचर पानी की तेज़ धार के पास मेरा हाथ ले गईं। जैसे ही ठंडा पानी मेरी बाँह पर गिरा उन्होंने मेरे हाथ पर धीरे-धीरे लिखा water । पहले एक बार फिर बार-बार। मैं बिना हिले-डुले बुत बनी खड़ी रही। मेरा पूरा ध्यान उनकी उँगलियों की हरकत पर था।
अचानक जैसे मेरे आगे भाषा का रहस्य खुल गया था। मुझे पता चला कि water यानी वह ठंडी चीज़ जो अभी-अभी मेरे हाथ पर बह रही थी उसका कोई अर्थ भी है। उस जीते-जागते शब्द ने जैसे मेरे अंदर नई आशाएँ और नई उम्मीदें जगा दीं। यह सच है कि सीखने के रास्ते में कई दिक्कतें आईं, पर समय के साथ उनको दूर होना ही था।
सीखने की ललक से भरकर हम तेज़ कदमों से घर की ओर चल दिए। रास्ते में जिस भी चीज़ को मैंने छुआ, मुझे वह जीवन से भरी लगी। घर की चौखट पर पहुँचते ही मुझे उस गुड़िया की याद आई जिसे मैं टुकड़े-टुकड़े कर चुकी थी। उन टुकड़ों को समेटकर जोड़ने की मेरी कोशिश नाकाम हो गई थी। मेरी आँखें आँसुओं से भर गईं। पहली बार मुझे अपने किए पर अफसोस और दुख हो रहा था।

“मेरी जिंदगी का एक दिन” कहानी की समीक्षा:-
“मेरी जिंदगी का एक दिन” कहानी हमें ये सीखती है कि शिक्षा और मार्गदर्शन हमारे में एक बहुत महत्वपूर्ण स्थान रखता है और इसके बिना कोई भी मनुष्य अपने जीवन को पूरी तरह बदल सकता है। “मेरी जिंदगी का एक दिन” कहानी का सबसे महत्वपूर्ण दिन वह है जब ‘water’ शब्द के माध्यम से हेलेन केलर को ये समझ आता है कि हर वस्तु का एक नाम और अर्थ होता है। ये अनुभव उनके लिए एकदम नवीन होता है। इससे पहले तक वे केवल संकेतों की नकल कर रही थी, लेकिन इस घटना के पश्चात से उन्होंने वास्तव में सीखना और समझना शुरू कर दिया।
“मेरी जिंदगी का एक दिन” कहानी से हमे ये शिक्षा मिलती है कि धैर्य, मेहनत और सीखने की इच्छा से किसी भी कठिनाई को पर किया जा सकता है। अंततः “मेरी जिंदगी का एक दिन” कहानी हमें प्रेरणा देती है कि चाहे परिस्थितियां कितनी भी विपरीत क्यों न हो, हमारे अंदर सीखने की लगन और किसी का सही मार्गदर्शन हो तो हम अपने जीवन को नई दिशा दे सकते है और अंधकार से प्रकाश की ओर बढ़ सकते है।
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