दो भाई
लेखक परिचय:-
मुंशी प्रेमचंद जी का जन्म 31 जुलाई १८८०, लमही, वाराणसी (उत्तर प्रदेश) में हुआ था।उनका असली नाम गणपत राय श्रीवास्तव है। उनको उपन्यास ‘सम्राट’ तथा ‘कलम का समर्थक कहा जाता था। उन्होंने अपने काव्यों (गोदान, गबन, ईदगाह, सेवासदन, कर्मभूमि, निर्मला, रंगभूमि, कफन, आदि) द्वारा समाज में बहुत से शोषित वर्ग के लिए आवाज उठाई।
उपन्यासों के साथ साथ उन्होंने पत्रिकाओं के संपादन का काम भी किया। उनकी भाषा सरल, सहज, व्यावहारिक और प्रभावमयी है, जिसमें आम बोल चल के साथ उर्दू, फारसी और देशज शब्दों का मिश्रण देखने को मिलता है। उनकी मृत्यु 8 अक्टुबर, 1936 को हुई।
ततकाल सूर्य की सुहावनी सुनहरी धूप में कलावती दोनों बेटों को जांघों पर बैठा दूध और रोटी खिलाती। केदार बड़ा था, माधव छोटा। दोनों मुंह में कौर लिये, कई पग उछल – कूद कर फिर जांघों पर आ बैठते और अपनी तोतली बोली में इस प्रार्थना की रट लगाते थे, जिसमें एक पुराने सहृदय कवि ने किसी जाड़े के सताये हुए बालक के हृदयोद्गार को प्रकट किया है –
“दैव – दैव घाम करो तुम्हारे बालक को लगता जाड़”
मां उन्हें चुमकार कर बुलाती और बड़े – बड़े कौर खिलाती। उसके हृदय मे प्रेम की उमंग थी और नेत्रों में गर्व की झलक। दोनों भाई बड़े हुए। साथ – साथ गले में बांहें डाले खेलते थे। केदार की बुद्धि चुस्त थी।
माधव का शरीर। दोनों में इतना स्नेह था कि साथ – साथ पाठशाला जाते, साथ – साथ खाते और साथ ही साथ रहते थे। दोनों भाइयों का ब्याह हुआ। केदार की वधू चम्पा अमित – भाषिणी और चंचला थी। माधव की वधू श्यामा सांवली – सलोनी, रूपराशि की खान थी। बड़ी ही मृदुभाषिणी, बड़ी ही सुशीला और शांतस्वभावा थी।

केदार चम्पा पर मोहे और माधव श्यामा पर रीझे। परन्तु कलावती का मन किसी से न मिला। वह दोनों से प्रसन्न और दोनों से अप्रसन्न थी। उसकी शिक्षा – दीक्षा का बहुत अंश इस व्यर्थ के प्रयत्न में व्यय होता था कि चम्पा अपनी कार्यकुशलता का एक भाग श्यामा के शांत स्वभाव से बदल ले।
दोनों भाई संतानवान हुए। हरा – भरा वृक्ष खूब फैला और फलों से लद गया। कुत्सित वृक्ष में केवल एक फल दृष्टिगोचर हुआ, वह भी कुछ पीला – सा, मुरझाया हुआ; किन्तु दोनों अप्रसन्न थे। माधव को धन – सम्पत्ति की लालसा थी और केदार को संतान की अभिलाषा।
भाग्य की इस कूटनीति ने शनैः शनैः द्वेष का रूप धारण किया, जो स्वाभाविक था। श्यामा अपने लड़कों को संवारने सुधारने में लगी रहती; उसे सिर उठाने की फुरसत नहीं मिलती थी। बेचारी चम्पा को चूल्हे में जलना और चक्की में पिसना पड़ता। यह अनीति कभी – कभी कटु शब्दों में निकल जाती।
श्यामा सुनती, कुढ़ती और चुपचाप सह लेती। परन्तु उसकी यह सहनशीलता चम्पा के क्रोध को शांत करने के बदले और बढ़ाती। यहां तक कि प्याला लबालब भर गया। हिरन भागने की राह न पा कर शिकारी की तरफ लपका। चम्पा और श्यामा समकोण बनाने वाली रेखाओं की भांति अलग हो गयीं। उस दिन एक ही घर में दो चूल्हे जले, परन्तु भाइयों ने दाने की सूरत न देखी और कलावती सारे दिन रोती रही।
कई वर्ष बीत गये। दोनों भाई जो किसी समय एक ही पालथी पर बैठते थे, एक ही थाली में खाते थे और एक ही छाती से दूध पीते थे. उन्हें अब एक घर में, एक गांव में रहना कठिन हो गया। परन्तु कुल की साख में बट्टा न लगे, इसलिए ईर्ष्या और द्वेष की धधकी हुई आग को राख के नीचे दबाने की व्यर्थ चेष्टा की जाती थी।
उन लोगों में अब धातु – स्नेह न था। केवल भाई के नाम की लाज थी। मां भी जीवित थी, पर दोनों बेटों का वैमनस्य देख कर आंसू बहाया करती। हृदय में प्रेम था, पर नेत्रों में अभिमान न था। कुसुम वही था, परन्तु वह छटा न थी।
दोनों भाई जब लड़के थे, तब एक को रोते देख दूसरा भी रोने लगता था, तब वह नादान, बेसमझ और भोले थे। आज एक को रोते हुए देख दूसरा हंसता और तालियां बजाता। अब वह समझदार और बुद्धिमान हो गये थे।
जब उन्हें अपने – पराये की पहचान न थी, उस समय यदि कोई छेड़ने के लिए एक को अपने साथ ले जाने की धमकी देता, तो दूसरा जमीन पर लोट जाता और उस आदमी का कुर्ता पकड़ लेता। अब यदि एक भाई की मृत्यु भी धमकाती तो दूसरे के नेत्रों में आंसू न आते। अब उन्हें अपने पराये की पहचान हो गयी थी।
बेचारे माधव की दशा शोचनीय थी। खर्च अधिक था और आमदनी कम। उस पर कुल – मर्यादा का निर्वाह। हृदय चाहे रोये, पर होंठ हंसते रहें। हृदय चाहे मलीन हो, पर कपड़े मैले न हों! चार पुत्र थे, चार पुत्रियां और आवश्यक वस्तुएं मोतियों के मोल। कुछ पाइयों की जमींदारी कहां तक सम्हालती।
लड़कों का ब्याह अपने वश की बात थी, पर लड़कियों का विवाह कैसे टल सकता! दो पाई जमीन पहली कन्या के विवाह में भेंट हो गयी। उस पर भी बराती बिना भात खाये आंगन से उठ गये। शेष दूसरी कन्या के विवाह में निकल गयी। साल भर बाद तीसरी लड़की का विवाह हुआ, पेड़ – पत्ते भी न बचे। हां, अब की डाल भरपूर थी। परन्तु दरिद्रता और धरोहर में वही सम्बन्ध है जो मांस और कुत्ते में।
इस कन्या का अभी गौना न हुआ कि माधव पर दो साल के बकाया लगान का वारंट आ पहुंचा। कन्या के गहने गिरों (बंदक) रखे गये। गला छूटा। चम्पा इसी समय की ताक में थी। तुरन्त नये नातेदारों को सूचना दी। तुम लोग बेसुध बैठे हो, यहां गहनों का सफाया हुआ जाता है। दूसरे दिन एक नाई और दो ब्राह्मण माधव के दरवाजे पर आ कर बैठ गये। बेचारे के गले में फांसी पड़ गयी। रुपये कहां से आवें, न जमीन, न जायदाद, न बाग, न बगीचा।
रहा विश्वास, वह कभी का उठ चुका था; अब यदि कोई सम्पत्ति थी, तो केवल वही दो कोठरियां, जिसमें उसने अपनी सारी आयु बितायी थी, और उनका कोई ग्राहक न था। विलम्ब से नाक कटी जाती थी। विवश हो कर केदार के पास आया और आंखों में आंसू भरे बोला, भैया, इस समय मैं बड़े संकट में हूं, मेरी सहायता करो।
केदार ने उत्तर दिया – मधू! आजकल मैं भी तंग हो रहा हूं, तुमसे सच कहता हूं। चम्पा अधिकारपूर्ण स्वर से बोली – अरे, तो क्या इनके लिए भी तंग हो रहे हैं! अलग भोजन करने से क्या इज्जत अलग हो जायगी !
केदार ने स्त्री की ओर कनखियों से ताक कर कहा – हीं – नहीं था। हाथ तंग है तो क्या, कोई न कोई प्रबन्ध किया ही जायगा।
चम्मा ने माधव से पूछा – पांच बी से कुछ ऊपर ही पर गहने रखे थे।
माधव ने उत्तर दिया हां, ब्याज सहित कोई सवा सौ रुपये होते हैं।
केदार रामायण पढ़ रहे थे। फिर पढ़ने में लग गये। चम्या ने तत्त्व की बातचीत शुरू की – रुपया बहुत है, हमारे पास होता तो कोई बात न थी। परन्तु हमें भी दूसरे से दिलाना पड़ेगा और महाजन बिना कुछ लिखाये – पढ़ाये रुपया देते नहीं।
माधव ने सोचा, यदि मेरे पास कुछ लिखाने – पढ़ाने को होता, तो क्या और महाजन मर गये थे, तुम्हारे दरवाजे आता क्यों? बोला – लिखने – पढ़ने को मेरे पास है ही क्या? जो कुछ जगह-जायदाद है, वह यही घर है।
केदार और चम्पा ने एक दूसरे को मर्मभेदी नयनों से देखा और मन ही मन कहा – क्या आज सचमुच जीवन की प्यारी अभिलाषाएं पूरी होंगी। परन्तु हृदय की यह उमंग मुंह तक आते-आते गम्भीर रूप धारण कर गयी। चम्पा बड़ी गम्भीरता से बोली-घर पर तो कोई महाजन कदाचित् ही रुपया दे। शहर हो तो कुछ किराया हो आवे, पर गंवई में तो कोई सेंत में रहने वाला भी नहीं। फिर साझे की चीज ठहरी।
केदार डरे कि कहीं चम्पा की कठोरता से खेल बिगड़ न जाय। बोले – एक महाजन से मेरी जान-पहचान है, वह कदाचित् कहने – सुनने में आ जाय।
चम्पा ने गर्दन हिला कर इस युक्ति की सराहना की और बोली पर दो – चार बीस से अधिक मिलना कठिन है।
केदार ने जान पर खेल कर कहा – अरे, बहुत दबाने पर चार बीस हो जायेंगे। और क्या !
अबकी चम्पा ने तीव्र दृष्टि से केदार को देखा और अनमनी – सी हो कर बोली – महाजन ऐसे अंधे नहीं होते।
माधव अपने भाई – भावज के इस गुप्त रहस्य को कुछ – कुछ समझता था। वह चकित था कि इन्हें इतनी बुद्धि कहां से मिल गयी। बोला और रुपये कहां से आवेंगे ?
चम्पा चिढ़ कर बोली – और रुपयों के लिए और फिक्र करो! सवा सौ रुपये इन दो कोठरियों के इस जन्म में कोई न देगा, चार बीस चाहो तो एक महाजन से दिला दूं, लिखा – पढ़ी कर लो।
माधव इन रहस्यमय बातों से सशंक हो गया। उसे भय हुआ कि यह लोग मेरे साथ कोई गहरी चाल चल रहे हैं। दृढ़ता के साथ अड़ कर बोला – और कौन – सी फिक्र करूं? गहने होते तो कहता, लाओ रख दूं। यहां तो कच्चा सूत भी नहीं है। जब बदनाम हुए तो क्या दस के लिए क्या पचास के लिए, दोनों एक ही बात है।
यदि घर बेच कर मेरा नाम रह जाय, तो यहां तक तो स्वीकार है; परन्तु घर भी बेचूं और उस पर भी प्रतिष्ठा धूल में मिले, ऐसा मैं न करूंगा। केवल नाम का ध्यान है, नहीं एक बार नहीं कर जाऊं तो मेरा कोई क्या करेगा ? और सच पूछो तो मुझे अपने नाम की कोई चिंता नहीं है। मुझे कौन जानता है ? संसार तो भैया को हंसेगा।
केदार का मुंह सूख गया। चम्पा भी चकरा गयी। वह बड़ी चतुर वाक्य – निपुण रमणी थी। उसे माधव जैसे गंवार से ऐसी दृढ़ता की आशा न थी। उसकी ओर आदर से देख कर बोली – लालू, कभी – कभी तुम भी लड़कों की – सी बातें करते हो। भला इस झोंपड़ी पर कौन सौ रुपये निकाल कर देगा ?
तुम सवा सौ के बदले सौ ही दिलाओ, मैं आज ही अपना हिस्सा बेचती हूं। उतना ही मेरा भी तो है? घर पर तो तुमको वही चार बीस मिलेंगे। हां, और रुपयों का प्रबंध हम – आप कर देंगे। इज्जत हमारी – तुम्हारी एक ही है, वह न जाने पायेगी। वह रुपया अलग खाते में चढ़ा लिया जायगा।
माधव की इच्छाएं पूरी हुई। उसने मैदान मार लिया। सोचने लगा, मुझे तो रुपयों से काम है, चाहे एक नहीं, दस खाते में चढ़ा लो। रहा मकान वह जीते जी नहीं छोड़ने का। प्रसन्न हो कर चला। उसके जाने के बाद केदार और चम्पा ने कपट भेष त्याग दिया और बड़ी देर तक एक दूसरे को इस कड़े सौदे का दोषी सिद्ध करने की चेष्टा करते रहे।
अंत में मन को इस तरह संतोष दिया कि भोजन बहुत मधुर नहीं, किन्तु भर – कठौत तो है। घर, हां, देखेंगे कि श्यामा रानी इस घर में कैसे राज करती हैं। केदार के दरवाजे पर दो बैल खड़े हैं। इनमें कितनी संघ – शक्ति, कितनी मित्रता और कितना प्रेम है। दोनों एक ही जुए में चलते हैं; बस इनमें इतना ही नाता है।
किन्तु अभी कुछ दिन हुए, जब इनमें से एक चम्पा के मैके मंगनी गया था, तो दूसरे ने तीन दिन तक नाद में मुंह नहीं डाला। परन्तु शोक, एक गोद के खेले भाई, एक छाती से दूध पीनेवाले आज इतने वेगाने हो रहे हैं कि एक घर में रहना भी नहीं चाहते।
प्रातःकाल था। केदार के द्वार पर गांव के मुखिया और नंबरदार विराजमान थे। मुंशी दातादयाल अभिमान से चारपाई पर बैठे रेहन का मसविदा तैयार करने में लगे थे। बार – बार कलम बनाते और बार – बार खत रखते, पर खत की शान न सुधरती थी। केदार का मुखारविंद विकसित था और चम्पा फूली नहीं समाती थी। माधव कुम्हलाया और म्लान था।
मुखिया ने कहा – भाई ऐसा हित, न भाई ऐसा शत्रु। केदार ने छोटे भाई की लाज रख ली |
नम्बरदार ने अनुमोदन किया – भाई हो तो ऐसा हो।
मुख्तार ने कहा – भाई, सपूतों का यही काम है।
दातादयाल ने पूछा – रेहन लिखने वाले का नाम ?
बड़े भाई बोले – माधव वल्द शिवदत्त।
‘और लिखानेवाले का?’
‘केदार वल्द शिवदत्त।’
माधव ने बड़े भाई की ओर चकित होकर देखा। आंखें डबडबा आर्यों। केदार उसकी ओर देख न सका। नंबरदार, मुखिया और मुख्तार भी विस्मित हुए। क्या केदार खुद ही रुपया दे रहा है ? बातचीत तो किसी साहूकार की थी। जब घर ही में रुपया मौजूद है तो इस रेहननामे की आवश्यकता ही क्या थी? भाई – भाई में इतना अविश्वास। अरे, राम! राम !
क्या माधव 80 रु. का भी महंगा है! और यदि दबा ही बैठता, तो क्या रुपये पानी में चले जाते। सभी की आंखें सैन द्वारा परस्पर बातें करने लगीं, मानो आश्चर्य की अथाह नदी में नौकाएं डगमगाने लगीं।
श्यामा दरवाजे की चौखट पर खड़ी थी। वह सदा केदार की प्रतिष्ठा करती थी, परन्तु आज केवल लोकरीति ने उसे अपने जेठ को आड़े हाथों लेने से रोका। बूढ़ी अम्मां ने सुना तो सूखी नदी उमड़ आयी। उसने एक बार आकाश की ओर देखा और माथा ठोंक लिया।
अब उसे उस दिन का स्मरण हुआ जब ऐसा ही सुहावना सुनहरा प्रभात था और दो प्यारे-प्यारे बच्चे उसकी गोद में बैठे हुए उछल – कूद कर दूध – रोटी खाते थे। उस समय माता के नेत्रों में कितना अभिमान था, हृदय में कितनी उमंग और कितना उत्साह !
परन्तु आज, आह ! आज नयनों में लज्जा है और हृदय में शोक – संताप। उसने पृथ्वी की ओर देख कर कातर स्वर में कहा – हे नारायण! क्या ऐसे पुत्रों को मेरी ही कोख में जन्म लेना था ?
प्रेमचंद के द्वारा लिखित “दो भाई” कहानी एक भावनात्मक और पारिवारिक कहानी है, जो पारिवारिक जिम्मेदारी और भाईचारे के रिश्तों की उलझनों को प्रकट करती है। इस कहानी से ये उदेश्य मिलता है कि रिश्तों मे उम्र या पद का आहंकार पारिवारिक प्यार को कम करता है, इसलिए रिश्तों मे स्वाभिमान के साथ-साथ स्नेह भी जरूरी है।
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