बिनु गुपाल बैरिनि भई कुंजैं ( पद )
जीवन परिचय :-
सूरदास जी कृष्णभक्ति काव्य धारा के सर्वश्रेष्ठ कवि थे। इनका जन्म सम्वत् 1540 (1483 ई०) में सीही नामक ग्राम में हुआ। कुछ विद्वान सूरदास का जन्म स्थान रूनकता मानते है। स्वामी वल्लभाचार्य जी सूरदास के गुरु थे। सूरदास वात्सल्य व श्रृंगार के अन्यतम कवि हैं।
सूरदास की भक्ति के विविध रूप हैं। सख्यभाव की भक्ति, वात्सल्यभाव की भक्ति उनके भक्ति के प्रमुख रूप हैं। इन्हीं भक्ति को आधार बनाकर सूर ने अपनी बंद आँखों से वो सबको देख लिया, जो लोग खुली आँखों से भी नहीं देख पाते।
आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने ठीक ही कहा है, ‘वात्सल्य और श्रृंगार के क्षेत्रों का जितना अधिक उद्घाटन सूर ने अपनी बंद आँखों से किया, उतना किसी अन्य कवि ने नहीं। इन क्षेत्रों का कोना-कोना झाँक आए।
उक्त दोनों के प्रवर्तक रति भाव के भीतर की जितनी मानसिक वृत्तियों और दशाओंका अनुभव और प्रत्त्यक्षीकरण सूर कर सके उतनी और कोई नहीं कर सका। हिंदी साहित्य में शृंगार का रसराजत्व यदि किसी ने पूर्णरूप से निभाया है तो सूर ने।
अगर सूरदास के पद में सूर के वात्सल्य वर्णन की बात करें तो कहना होगा, ‘सूर ही वात्सल्य और वात्सल्य ही सूर है।’ कृष्ण की बाल लीलाओं का जो चित्रण सूर ने कर दिया है वह अन्यत्र दुर्लभ है। कह सकते हैं कि सूर ने पुरुष होकर भी माँ का हृदय पाया था। श्रीकृष्ण को देखकर माँ यशोदा के मन में कैसी उत्सुकता है, कैसी अभिलाषा है, उसका चित्रण सूर ने मातृ हृदय से किया है
इनकी प्रमुख रचनाएँ – सूर सागर, सूर सारावली, साहित्य लहरी हैं।
सूरदास के पद में बालकृष्ण के सौन्दर्य, चपल चेष्टाओं और क्रीड़ाओं की मनोरम झाँकी के साथ ही कृष्ण व गोपियों के अनन्य प्रेम का सरस, सजीव व मनोहारी चित्रण किया है। सूरदास जी ने भक्ति व विनय सम्बन्धी पदों की भी रचना की है।
इनकी काव्यभाषा सरस व मधुर ब्रजभाषा है। सूरदास के पद विभिन्न राग-रागिनियों में आबद्ध हैं।
जिनमें साहित्य व संगीत का मणिकांचन संयोग हुआ है। गेयता, स्वाभाविकता, सरसता व मार्मिकता इनके काव्य का अद्वितीय गुण है। अपने आराध्य श्रीकृष्ण की जीवन लीलाओं का गायन ही सूरदास के जीवन का लक्ष्य था। इनकी मृत्यु सम्वत् 1620 (1563 ई०) में हुई।
बिनु गुपाल बैरिनि भई कुंजैं ।
(अर्थात्:- श्री कृष्ण के बिना ये यह कुंज अर्थात् बाग शत्रु का लगने लगा है।)
ये लता लगति अति सीतल, अब भई विषम ज्वाल की पुंजैं ।
(अर्थात्:- कृष्ण के रहते जो लताएं शीतल तथा अत्यंत सुखमयी लगती थी वह लताएं कृष्ण के जाने के पश्चात अब अग्नि पुंज यानि आग की भांति जलाने वाली लग रही है।)
बृथा बहति जमुना, खग बोलत, बृथा कमल फूलै, अलि गुंजैं ।
(अर्थात्:- कृष्ण के जाने के पश्चात् यमुना का बहना, पक्षियों का चह-चाहना, कमल के फूलों का खिलना, और भंवरों का बोलना सब कुछ बिल्कुल व्यर्थ लग रहा है)
पवन, पानि, घनसार, सँजीवनि, दधिसुत – किरन भानु भई भुजैं ।
(अर्थात्:- हवा, जल, चंदन (धनसार), अमृत समान चीज़ें और चंद सूरज की किरणे भी अब जलने वाली प्रतीत होती है।)
ए उधो ! कहियो माधव सो बिरह कदन करि मारत लुंजैं ।
(अर्थात्:- गोपियां कहती है:- हे उद्धव! आप लौट कर कृष्ण से कहिएगा की उनका वियोग हमें बहुत दुख दे रहा है और धीरे-धीरे हमारी जान ले रहा है।)
सूरदास प्रभु कौ मग जोवत, अँखिया भई बरन ज्यौं गुंजैं ।।
(अर्थात्:- गोपियां कहती है कि प्रभु की राह देखते देखते हमारी आंखे भंवरों के रंग के समान काली हो गई है।।)
संदर्भ :-
प्रस्तुत पद सूरदास जी द्वारा रचित ‘सूरदास के पद’ से लिया गया है।
प्रसंग :-
प्रस्तुत पद मे कृष्ण के विरह मे गोपियाँ दु:खी होकर उद्धव जी से कहती है कि कृष्ण के विरह मे सारी सुख देने वाली वस्तुएँ उसे कष्ट दाई लग रही है।
व्याख्या
गोपियाँ दुःखी होकर उद्धव जी से कहती । है। है! उद्धव कृष्ण के विरह मे सारी सुखदाई वस्तुएँ अब कष्टदायिनी बन गयी है। व्रज के वे कानन कुंज जहाँ प्रिय कृष्ण के साथ विरह किये थे वे अब शत्रु के समान अप्रिय लगती है। जो लताए तन – मन को शीतलता प्रदान करती थी अब भयंकर अग्नि के समूह के समान जला देने वाली लग रही है।
बहती हुई जमुना की जलधारा, चहचहाते हुए पक्षी, खिले हुए कमल के पुष्पो गुजार करते और जैसे सुन्दर दृश्य भी हमे व्यर्थ प्रतीत हो रहे थे है। वायु, जल, कपूर, बादल और चन्द्रमा की किरणे सभी शीतलता प्रदान करने वाली वस्तुएँ हमे आज प्रचण्ड सूर्य के समान जलाने वाली बन गई है।
आज प्रचण्ड सूर्य के समान जलाने वाली बन गई है। हे उद्धव आप मथुरा जाकर निर्दय कृष्ण से जाकर कहना उनके वियोग ने हमे कष्ट देकर विकलांग और लूँज (अशक्त ) बना दिया है। अब उन्हे बताना कि उसके आने की प्रतीक्षा मे हमारी आँखे गुँजो के समान लाल होकर दुख रही है।
विशेष :-
- गोपियों की विरह व्यथा का सजीव चिरण सूरदास जी ने किया है। विरह की दशा मे सुखकर वस्तुएँ भी अप्रिय और दु:खदाई बन जाती है।
- “भावो से भरे छंदों मे अनुप्रास अलंकार है।”
- ब्रजभाषा का लालित्य पद मे विभूषित है।
सूरदास के पद में सूरदास द्वारा लिखित “बिनु गुपाल बैरिनि भई कुंजैं” पद ‘सुरसागर’ के ‘भ्रमरगीत’ प्रसंग से लिया गया है। सूरदास के पद में गोपियाँ उद्धव जी से कहती है कि श्रीकृष के बिना ब्रज की कुंज, जो कभी सुखद लगती थी, अब शत्रु के समान प्रतीत हो रही है, जिसमे श्रीकृष्ण के मथुरा जाने के बाद गोपियों की विरह दिशा का वर्णन किया गया है।
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