रंगीले बाबू
लेखक परिचय:-
मुंशी प्रेमचंद जी का जन्म 31 जुलाई १८८०, लमही, वाराणसी (उत्तर प्रदेश) में हुआ था।उनका असली नाम गणपत राय श्रीवास्तव है। उनको उपन्यास ‘सम्राट’ तथा ‘कलम का समर्थक कहा जाता था। उन्होंने अपने काव्यों (गोदान, गबन, ईदगाह, सेवासदन, कर्मभूमि, निर्मला, रंगभूमि, कफन, आदि) द्वारा समाज में बहुत से शोषित वर्ग के लिए आवाज उठाई। उपन्यासों के साथ साथ उन्होंने पत्रिकाओं के संपादन का काम भी किया। उनकी भाषा सरल, सहज, व्यावहारिक और प्रभावमयी है, जिसमें आम बोल चल के साथ उर्दू, फारसी और देशज शब्दों का मिश्रण देखने को मिलता है। उनकी मृत्यु 8 अक्टुबर, 1936 को हुई।
बाबू रसिकलाल ( रंगीले बाबू ) को मैं उस वक्त से जानता हूं, जब वह लॉ कॉलेज में पढ़ते थे। मेरे सामने ही वह वकील हुए और आनन-फानन चमके। देखते -देखते बंगला बन गया, जमीन खरीद ली और शहर के रईसों में शुमार होने लगे, लेकिन मुझे न जाने क्यों उनके रंग-ढंग कुछ बहुत जंचते न थे। मैं यह नहीं देख सकता कि कोई भला आदमी ख्वाहमख्वाह टेढ़ी टोपी लगाकर निकले या सुरमा लगाकर, मांग निकालकर, मुंह को पान से फुलाकर, गले में मोतिया या बेले के गजरे डाले, तंजेब का चुन्नटदार कुरता और महीन धोती पहने बाजार में कोठों की ओर ताक- झांक करता, ठट्ठे मारता निकले। मुझे उससे चिढ़ हो जाती है। वह मेरे पास म्यूनिसिपल मेम्बरी के लिए वोट मांगने आये तो कभी न दूं, उससे याराना निभाना तो दूर की बात है। भले आदमी को जरा गम्भीर, जरा सादगी-पसन्द देखना चाहता हूं। मुझे अगर किसी मुकदमे में वकील करना पड़े तो मैं ऐसे आदमी को कभी न करूं, चाहे वह रासबिहारी घोष ही का-सा कानूनदां क्यों न हो। बाबू रसिकलाल ( रंगीले बाबू ) इसी तरह के रंगीले आदमी हैं। उनकी तर्क-शक्ति ऊंचे दरजे की है, मानता हूं। जिरह भी अच्छी करते हैं, यह भी मुझे स्वीकार है, लेकिन सीधी टोपी लगाने और सीधी चाल चलने से उनकी वकालत कुछ ठंडी न पड़ जायेगी। मेरा तो ख्याल यह है कि बांकपन छोड़कर भले आदमी बन जायें तो उनकी प्रैक्टिस दुगनी हो सकती है, लेकिन अपने को क्या पड़ी है कि किसी की बातों में दखल दें? जब कभी उनका सामना हो जाता है तो मैं दूसरी ओर ताकने लगता हूं या किसी गली में हो रहता हूं। मैं सड़क पर उनसे बातें करना मुनासिब नहीं समझता। क्या हुआ वह नामी वकील हैं और मैं बेचारा स्कूल – मास्टर हूं? मुझे उनसे किसी तरह का द्वेष नहीं। उन्होंने मेरा क्या बिगाड़ा है जों मैं उनसे जलूं? मेरी तो वह बड़ी इज्जत और खातिर करते हैं। अपनी लड़की की शादी में मैं उनसे दरियां और दूसरा सामान मांगने गया था। उन्होंने दो ठेले भर दरियां, कालीनें, जाजिम, चौकियां, मसनदें भेज दीं। नहीं, मुझे उनसे जरा भी द्वेष नहीं-बहुत दिनों के परिचय के नाते मुझे उनसे स्नेह है, लेकिन उनका यह बांकपन मुझे नहीं अच्छा लगता। वह चलते हैं तो ऐसा जान पड़ता है, जैसे दुनिया को ललकारते चलते हों – देखें, मेरा कोई क्या कर सकता है? मुझे किसी की परवाह नहीं है। एक बार मुझे स्टेशन पर मिल गये। लपककर मेरे कन्धे पर हाथ ही तो रख दिया – “आप तो मास्टर साहब, कभी नजर ही नहीं आते, कभी भला साल में एकदुगनीआध बार तो दर्शन दे दिया कीजिए।” मैंने अपना कन्धा छुड़ाते हुए कहा, “क्या करें साहब, अवकाश ही नहीं मिलता।” बस, आपने चट कर बाजारी शेर पढ़ाः
तुम्हें गैरों से कब फुरसत,
हम अपने गम से कब खाली ?
चलो, बस हो चुका मिलना
न तुम खाली न हम खाली।
मैंने हंस तो दियादुगनीजो आदमी अपना लिहाज करे, उससे कोई कैसे रुखाई करे ? फिर बड़े आदमियों से बिगाड़ करना भी नहीं चाहता, न जाने कब अपनी गरज लेकर उनके पास जाना पड़े-लेकिन मुझे उनकी यह बेतकल्लुफी कुछ अच्छी न लगी। यों मैं न कोई तपस्वी हूं, न जाहिद। अरसिक होना उस बांकपन से भी बुरा है। शुष्क जीवन भी कोई जीवन है, जिसमें विनोद के लिए स्थान न हो? वन की शोभा हरे – भरे, सरस वृक्षों से है, सूखे हुए ठूंठों से नहीं, लेकिन मैं चाहता हूं, आदमी जो कुछ करे छिपाकर करे। शराब पीना चाहते हो, पियो मगर पियो एकान्त में। इसकी क्या जरूरत कि शराब में मस्त होकर बहकते फिरो ? रूप के उपासक बनना चाहते हो, बनो। लेकिन इसकी क्या जरूरत है कि वेश्याओं को दायें-बायें बैठाये मोटर में अपने छैलपन का ढिंढोरा पीटते फिरो? फिर, रसिकता की भी एक उम्र होती है। जब लड़के जवान हो गये, लड़कियों की शादी हो गई, बाल पक चले, तो मेरे ख्याल में आदमी को कुछ गम्भीर हो जाना चाहिए। आपका दिल अभी जवान है, बहुत अच्छी बात है, मैं तुम्हें इस पर बधाई देता हूं। वासना कभी बूढ़ी नहीं होती, मेरा तो अनुभव है कि उम्र के साथ-साथ वह भी प्रौढ़ होती जाती है, लेकिन इस उम्र में कुलेलें करना मुझे ओछापन मालूम होता है। सींग कटाकर बछड़ा बनने वाली मनोवृत्ति का मैं कायल नहीं। कोई किसी का क्या कर लेगा ? लेकिन चार भले आदमी उंगली उठायें, ऐसा काम क्यों करो ? तुम्हें भगवान ने सम्पन्न बनाया है, बहुत अच्छी बात है, लेकिन अपनी सम्पन्नता को इस विपन्न संसार में दिखाते फिरना, जो क्षुधा से व्याकुल हैं, उनके सामने रसगुल्ले उड़ाना, इसमें न तो रसिकता है, न आदमियत।
बाबू रसिकलाल ( रंगीले बाबू ) की बड़ी लड़की का विवाह था। मथुरा से बारात आयी थी। ऐसे ठाठ की बारात यहां शायद ही कभी आयी हो। बड़ी धर्मशाला में जनवासा था। वर का पिता किसी रियासत का दीवान था। मैं भी बारातियों की सेवा – सत्कार में लगा हुआ था। एक हजार आदमी से कम न थे। इतने आदमियों का सत्कार करना हंसी नहीं है। यहां तो किसी बारात में सौ – पचास आदमी आ जाते हैं तो उनकी भी अच्छी तरह खातिर नहीं हो पाती। फिर बारातियों के मिजाज का क्या कहना। सभी तानाशाह बन जाते हैं। कोई चमेली का तेल मांगता है, कोई आंवले का; कोई केशरंजना, कोई शराब मांगता है; कोई अफीम ! साबुन चाहिए, इत्र चाहिए। एक हजार आदमियों के खाने का प्रबन्ध करना कितना कठिन है। मैं समझता हूं, 20-25 हजार के वारे – न्यारे हुए होंगे, लेकिन बाबू रसिकलाल ( रंगीले बाबू ) के माथे पर शिकन न आयी। वही बांकपन था, वही विनोद, वही बेफिक्री। न झुंझलाना, न बिगड़ना। बारातियों की ओर से ऐसी – ऐसी बेहूदा फरमाइशें होती थीं कि हमें गुस्सा आ जाता था। पाव – आध – पाव भंग बहुत है, यह पसेरी भर भंग लेकर क्या उसकी धूनी देंगे? जब सिनेमा के एक सौ अव्वल दरजे के टिकटों की फरमाइश हुई तो मुझसे न रहा गया। बाबू रसिकलाल ( रंगीले बाबू ) को खूब डांट बताई, और उसी क्रोध में जनवासे की ओर चला कि एक – एक को फटकारूं। लड़के का ब्याह करने आये हैं या किसी भले की इज्जत बिगाडने ? एक दिन बगैर सिनेमा देखे नहीं रहा जाता? ऐसे ही बडे शौकीन हो तो जेब से पैसे क्यों नहीं खर्च करते? लेकिन बाबू रसिकलाल ( रंगीले बाबू ) खड़े हंस रहे थे। भाईसाहब, क्यों इतना बिगड रहे हो? ये लोग तुम्हारे मेहमान हैं. मेहमान दस जूते भी लगाये तो बुरा न मानिए। यह सब जिन्दगी के तमाशे हैं। तमाशे में हम खुश होने जाते है, वहां रोना भी पड़े तो उसमें आनन्द है। लपककर सिनेमाघर से सौ टिकट ला दीजिए, सौ – दो – सौ रुपये का मुंह न देखिए। मैंने मन में कहा, मुफ्त का धन बटोरा है तो लुटाओं और नाम लूटो। यह कोई सत्कार नहीं है कि मेहमान की गुलामी की जाय। मेहमान उसी वक्त तक मेहमान है, जब तक वह मेहमान की तरह रहे। जब वह रोब जमाने लगे, बेइज्जती करने पर आमादा हो जाय, तो वह मेहमान नहीं, शैतान है।
इसके तीन महीने बाद सुना कि बाबू रसिकलाल ( रंगीले बाबू ) का दामाद मर गया, वही जिसकी नयी शादी हुई थी। सिविल सर्विस के लिए इंग्लैण्ड गया हुआ था। वहीं न्यूमोनिया हो गया। यह खबर सुनते ही मुझे रोमांच हो आया। उस युवक की सूरत आंखों में दौड़ गई। कितना सौम्य, कितना प्रतिभाशाली लड़का था और मरा जाकर इंग्लैण्ड में कि घर वाले देख भी न सके। और उस लड़की की क्या दशा होगी, जिसका सर्वनाश हो गया ? वाह रे दयालु भगवान् । और वाह रे तुम्हारी लीला! प्राणियों की होली बनाकर उसकी लपटों का तमाशा देखते हो। उसी वक्त भागा हुआ बाबू रसिकलाल ( रंगीले बाबू ) के पास गया और उनकी सूरत देखते ही मन की कुछ ऐसी दशा हुई कि चिंघाड़ मार कर रो पड़ा। बाबू रसिकलाल ( रंगीले बाबू ) आरामकुर्सी पर लेटे हुए थे। उठकर मुझे गले लगा लिया और उसी स्थिर, अविचलित, निर्द्वन्द्व भाव से बोले, “वाह मास्टर साहब, आपने तो बालकों को भी मात कर दिया, जिनकी मिठाई कोई छीनकर खा जाय तो रोने लगते हैं! बालक तो इसलिए रोता है कि उसके बदले में दूसरी मिठाई मिल जाय। आप तो ऐसी चीज के लिए रो रहे हैं जो किसी तरह मिल ही नहीं सकती। अरे साहब, यहां बेहया बनकर रहिए। मार खाते जाइए और मूंछों पर ताव देते जाइए। मजा तो तब है कि जल्लाद के पैरों – तले आकर भी वही अकड़ बनी रहे! अगर ईश्वर है, मुझे तो कुछ मालूम नहीं, लेकिन सुनता हूं कि वह दयालु है और दयालु ईश्वर भला निर्दयी कैसे हो सकता है? वह किसे मारता है, किसे जिलाता है, हमसे मतलब नहीं। उसके खिलौने हैं, खेले या तोड़े, हम क्यों उसके बीच में दखल दें? वह हमारा दुश्मन नहीं, न जालिम बादशाह है कि हमें सताकर खुश हो। मेरा लड़का घर में आग भी लगा दे तो मैं उसका दुश्मन न बनूंगा। मैंने तो उसे पाल – पोसकर बड़ा किया है, उससे क्या दुश्मनी करूं? भला ईश्वर कभी निर्दयी हो सकता है, जिसके प्रेम का स्वरूप यह ब्रह्माण्ड है? अगर ईश्वर नहीं है, मुझे मालूम नहीं, और कोई ऐसी शक्ति है, जिसे हमारी विपत्ति में आनन्द मिलता है तो साहब यहां रोने वाले नहीं। हाथों में ताकत होती और दुश्मन नजर आता तो हम भी कुछ जवांमर्दी दिखाते। अब अपनी बहादुरी दिखाने का इसके सिवा और क्या साधन है कि मार खाते जाओ और हंसते जाओ, अकड़ते जाओ! रोये तो अपनी हार को स्वीकार करेंगे। मार ले साले, जितना चाहे मार ले, लेकिन हंसते ही रहेंगे। मक्कार भी है, जादूगर भी। छिपकर वार करता है। आ जाय सामने तो दिखाऊं। हमें तो अपने उन बेचारे शायरों की अदा पसन्द है जो कब्र में भी माशूक के पाजेब की झंकार सुनकर मस्त होते रहते हैं।
” इसके बाद बाबू रसिकलाल ( रंगीले बाबू ) ने उर्दू शेरों का तांता बांध दिया और इस तरह तन्मय होकर उनका आनन्द उठाने लगे, मानो कुछ हुआ ही नहीं है। फिर बोले, “लड़की रो रही है। मैंने कहा, ऐसे बेवफा के लिए क्या रोना जो तुम्हें छोड़कर चल दिया! अगर उससे प्रेम है तो रोने की कोई जरूरत नहीं! प्रेम तो आनन्द की वस्तु है। अगर कहो, क्या दिल नहीं मानता, तो दिल को मनाओ। बस, दुःखी मत हो। दुःखी होना ईश्वर का अपमान करना है, और मानवता को कलंकित करना।”
मैं बाबू रसिकलाल ( रंगीले बाबू ) का मुंह ताकने लगा। उन्होंने यह कथन कुछ ऐसे उदात्त भाव से किया कि एक क्षण के लिए मुझ पर भी उसने जादू कर दिया। थोड़ी देर के बाद मैं वहां से चला तो दिल का बोझ बहुत – कुछ हलका हो गया था। मन में एक प्रकार का साहस उदय हो गया था जो विपत्ति और बाधा पर हंस रहा था।
थोड़े दिनों के बाद वहां से तबादला हो गया और बाबू रसिकलाल ( रंगीले बाबू ) जी की कोई खबर नहीं मिली। कोई साल भर के बाद एक दिन गुलाबी लिफाफे पर सुनहरे अक्षरों में छपा हुआ एक निमन्त्रण – पत्र मिला। रसिकलाल के बड़े लड़के का विवाह हो रहा था। नवेद के नीचे कलम से आग्रह किया गया था कि अवश्य आइए, वरना मुझे आपसे बड़ी शिकायत रहेगी। आधा मजा जाता रहेगा। एक उर्दू का शेर भी था –
इस शौके फिरावां की या रब,
आखिर कोई हद भी है कि नहीं;
इन्कार करे वह या वादा,
हम रास्ता देखते रहते हैं।
एक सप्ताह का समय था। मैंने नयी रेशमी अचकन बनवाई, नये जूते खरीदे और खूब बन – ठनकर चला। वधू के लिए एक अच्छी – सी काश्मीरी साड़ी ले ली। महीनों एक जगह रहते – रहते और एक ही काम करते – करते मन कुछ कुण्ठित – सा हो गया था। तीन – चार दिन खूब जलसे रहेंगे, गाने सुनूंगा, दावतें उड़ाऊंगा। मन बहाल हो जाएगा। रेलगाड़ी से उतरकर वेटिंग रूम में गया और अपना नया सूट पहना। बहुत दिनों बाद नया सूट पहनने की नौबत आई थी, पर आज भी मुझे नया सूट पहनकर वही खुशी हुई जो लड़कपन में होती थी। मन कितना ही उदास हो, नया सूट पहनकर हरा हो जाता है। मैं तो कहता हूं, बीमारी में बहुत – सी दवाएं न खाकर हम नया सूट बनवा लिया करें तो कम – से – कम उतना फायदा तो जरूर ही होगा जितना दवा खाने से होता है। क्या यह कोई बात ही नहीं कि जरा देर के लिए आप अपनी ही आंखों में कुछ ऊंचे हो जायें? मेरा अनुभव तो यह कहता है कि नया सूट हमारे अन्दर एक नया जीवन डाल देता है, जैसे सांप केंचुल बदले या वसन्त में वृक्षों में नयी कोंपलें निकल आयें।
स्टेशन से निकलकर मैंने तांगा लिया और बाबू रसिकलाल ( रंगीले बाबू ) के द्वार पर पहुंचा। तीन बजे होंगे। लू चल रही थी। मुंह झुलसा जाता था। द्वार पर शहनाइयां बज रही थीं। बन्दनवारें बंधी हुई थीं। तांगे से उतरकर अन्दर के सहन में पहुंचा। बहुत से आदमी आंगन के सहन के बीच में घेरा बांधे खड़े थे। मैंने समझा कि शायद जोड़े – गहने की नुमाइश हो रही होगी। भीड़ चीरकर घुसा – बस कुछ न पूछो, क्या देखा, जो ईश्वर सातवें बैरी को भी न दिखाए। अर्थी थी, पक्के काम के दोशाले से ढकी हुई, जिस पर फूल बिखरे हुए थे। मुझे ऐसा मालूम हुआ कि गिर पड़ूंगा।
सहसा बाबू रसिकलाल ( रंगीले बाबू ) पर मेरी निगाह पड़ गयी। रंगीन कपडों का एक गट्ठर लिये अन्दर से आये थे। न आंखों में आंसू, न मुख पर वेदना, न माथे पर शिकन। वही बांकी टोपी थी, वही रेशमी कुरता, वही महीन तंजेब की धोती। सब रो रहे थे, कोई आंसुओं के वेग को रोके हुए था, कोई शोक से विह्वल ! ये बाहर के आदमी थे। कोई मित्र था, कोई बन्धु और जो मरने वाले का बाप था, वह इन डगमगाने वाली नौकाओं और जहाजों के बीच में स्तम्भ की भांति खड़ा था। मैं दौड़कर उनके गले से लिपटकर रोने लगा। वह पानी की बूंद, जो पत्ते पर रुकी हुई थी, जरा – सी हवा पाकर ढुलक पड़ी।
बाबू रसिकलाल ( रंगीले बाबू ) ने मुझे गले से लगाते हुए कहा, “आप कब आये? क्या अभी चले आ रहे हैं? वाह, मुझे खबर ही न हुई। शादी की तैयारियों में ऐसा फंसा कि मेहमानों की खातिरदारी भी न कर सका। चलकर कपड़े उतारिए, मुंह – हाथ धोइए। अभी बारात में चलना पड़ेगा। पूरी तैयारी के साथ चलेंगे। बैण्ड, बीन, ताशा, शहनाई, डफली सभी कुछ साथ होंगे। कोतल घोड़े, हाथी, सवारियां सब कुछ मंगवाई हैं। आतिशबाजी, फूलों के तख्त, खूब धूम से चलेंगे। जेठे लड़के का ब्याह है, खूब दिल खोलकर करेंगे। गंगा के तट पर जनवासा होगा।”
इन शब्दों में शोक की कितनी भयंकर, कितनी अथाह वेदना थी! एक कुहराम मच गया। बाबू रसिकलाल ( रंगीले बाबू ) ने लाश के सिर पर बेलों का मौर पहनाकर कहा – “क्या रोते हो भाइयो! यह कोई नयी बात नहीं हुई है। रोज ही तो यह तमाशा देखते हैं, कभी अपने घर में, कभी दूसरे के घर में। रोज ही तो रोते हो, कभी अपने दुख से, कभी, पराये दुख से। कौन तुम्हारे रोने की परवाह करता है, कौन तुम्हारे आंसू पोंछता है, कौन तुम्हारी चीत्कार सुनता है? तुम रोये जाओ, वह अपना काम किये जायगा। फिर रोकर क्यों अपनी दुर्बलता दिखाते हो? उसकी चोटों को छाती पर लो और हंसकर दिखा दो तुम ऐसी चोटों की परवाह नहीं करते। उससे कहो, तेरे अस्त्रालय में जो सबसे घातक अस्त्र हो वह निकाल ला। यह क्या सुइयां – सी चुभोता है? पर हमारी कोई दलील नहीं सुनता। न सुने! हम भी अपनी अकड़ न छोड़ेंगे। उसी धूम – धाम से बारात निकालेंगे, खुशियां मनायेंगे।”
बाबू रसिकलाल ( रंगीले बाबू ) रोते तो और लोग भी उन्हें समझाते। इस विद्रोहभरी ललकार ने सबको स्तम्भित कर दिया। समझाता कौन? हमें वह ललकार विक्षिप्त वेदना – सी जान पड़ी जो आंसुओं से कहीं मर्मान्तक थी। चिनगारी के स्पर्श से आबले पड़ जाते हैं। दहकती हुई आग में पांव पड़ जाय तो भुन जायगा, आबले न पड़ेंगे। बाबू रसिकलाल ( रंगीले बाबू ) की वेदना वही दहकती हुई आग थी।
लाश मोटर पर रखी गयी। मोटर गुलाब के फूलों से सजाया गया था। किसी ने पुकारा, “राम नाम सत्य है!”
रसिकलाल ने उसे विनादभरी आंखों से देखा, “तुम भले जाते हो, लाला। यह विवाह का उत्सव है। हमारे लिए सत्य जीवन है, उसके सिवा जो कुछ है, मिथ्या है।”
बाजे – गाजे के साथ बारात चली। इतना बड़ा जुलूस तो मैंने शहर में नहीं देखा। विवाह के जुलूस में दो – चार सौ आदमियों से ज्यादा न होते। इस जुलूस की संख्या लाखों से कम न थी। धन्य हो बाबू रसिकलाल ( रंगीले बाबू )! धन्य तुम्हारा कलेजा ! बाबू रसिकलाल ( रंगीले बाबू ) उसी बांकी अदा से मोटर के पीछे घोड़े पर सवार चले जा रहे थे। जब लाश चिता पर रखी गयी तो बाबू रसिकलाल ( रंगीले बाबू ) ने एक बार जोर से छाती पर हाथ मारा। मानवता ने विद्रोही आत्मा को आन्दोलित किया, पर दूसरे ही क्षण उनके मुख पर वही कठोर मुस्कान चमक उठी। मानवता वह थी या यह, कौन कहे ?
उसके दो दिन बाद मैं नौकरी पर लौट गया। जब छुट्टियां होती हैं तो रसिकलाल से मिलने आता हूं। उन्होंने उस विद्रोह का एक अंश मुझे भी दे दिया है। अब जो कोई उनके आचार – व्यवहार पर आक्षेप करता है तो मैं केवल मुस्करा देता हूं।
प्रेमचंद द्वारा लिखित “रंगीले बाबू” कहानी में सामाजिक दिखावे, और पतन की ओर ले जाने वाली जीवनशैली का यथार्थवादी चित्रण करती है। रंगीले बाबू कहानी पूर्ण रूप से अधिवक्ता बाबू रसिक लाल पर केंद्रित है। रंगीले बाबू कहानी में कवि रसिक लाल जी की चरित्र तथा उनके व्यवहार के बारे m बताया गया है। लेखक ने बाबू रसिकलाल को एक होनहार और बहुत ही काबिल वकील की जगह पर एक रंगीला ( रंगीन मिज़ाज ) आदमी बताया है। इस कहानी में बताया जाता है की कैसे दिखावे की जिंदगी के कारण इंसान अपनी मेहनत की कमाई बर्बाद कर देते है और अंततः नैतिक व आर्थिक रूप से पतन की ओर चला जाता है।
प्रेमचंद जी द्वारा रचित ‘रंगीले बाबू’ जैसी और कहानियों को पढ़ने के लिए हमारे स्पेशल कैटेगरी प्रेमचंद को देखे। अगर आप हमारे द्वारा लिखे गए इस तरह के आर्टिकल्स में सहयोग कोई सहयोग देना चाहते है तो हमारे व्हाट्सएप चैनल को ज्वाइन कर के हमारे साथ जुड़िए।
