लोक साहित्य
⇒परिभाषा और वर्गीकरण:
साहित्य मानव मन की प्रतिछवी है। यह मानव मन के भाव, दशा, सामाजिक स्थितियों तथा विभिन्न परिस्थितियों की सहज अभिव्यक्ति है।
साहित्य दो प्रकार के होते है: शिष्ट साहित्य और लोक साहित्य ।
‘लोक’ शब्द का अभिप्राय जन-सामान्य से है जो अभिजात्य संस्कार, शास्त्रीयता, पाण्डित्य की चेतना तथा अंहकार से शून्य है। वैदिक साहित्य से लेकर वर्तमान समय तक लोक शब्द का प्रयोग इन्हीं जनसामान्य के लिए हुआ है। अर्थात् लोक साहित्य का तात्पर्य जनसामान्य और ‘Folk Music’समाज के साहित्य से है। वस्तुतः लोक साहित्या अंग्रेजी भाषा के ‘folk Literature’ का हिन्दी अनुवाद है। पाश्चात् प्रणाली में’ ‘folk Lore’ जैसे शब्द चलते है।
Literature शब्द Letters से निकला है जो केवल लिखित और पठित रूप को अभिव्यक्ति देता है जबकि विद्वानों का मानना है कि साहित्य को केवल लिपि में संकुचित नहीं किया जा सकता इसलिए मौखिक अभिव्यक्ति भी साहित्य का एक महत्वपूर्ण अंग है। है। लोक साहित्य अधिकतर मौखिक रूप में ही मिलता है जिसे वर्तमान में: लिपिबद्ध किया गया है।
लोक साहित्य का विषय क्षेत्र जन्म से लेकर मृत्यु तक के समस्त भावों को संजोए हुए है। यह जनमानस की प्राचीन संस्कृति, मान्यताओं, परंपराओं परम्परागों और सुख-दुख की सरल अभिव्यक्ति है। यह शुरू से ही मानतीय मूल्यों एवं एकता का परिपोषक व परिषोधक रहा है।
डॉ त्रिलोचन पांडे – “जंन साहित्य या लोक साहित्य उन समस्त परंपराओं, मौखिक तथा लिखित रचनाओं का समूह है जो किसी एक व्यक्ति या अनेक व्यक्तिओं द्वारा निर्मित तो हुआ है परंतु उसे समस्त जन समुदाय अपना मानता है। इस साहित्य में किसी जाति, समाज या एक क्षेत्र में रहने वाले सामान्य लोगों की परम्पराएँ, आचार-विचार, रीति-रिवाज़, हर्ष – विषाद आदि समाहित रहते है।”
डॉ रविंद्र भ्रमर – ” लोक-साहित्य जनमानस की सहज और स्वाभाविक अभिव्यक्ति है। यह बहुधा अलिखित ही रहता है और अपनी मौखिक परम्परा द्वारा एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक आगे बढ़ता है।”
अतः लोक-साहित्य जन सामान्य का जन सामान्य के द्वारा जन सामान्य के किस रचित साहित्य है।
⇒ विशेषताएँ :
1. लोक साहित्य सामान्यतः मौखिक रूप में विकसित होते है इसके रचनाकार अज्ञात होते है। तथा
2. यह किसी व्यक्ति विशेष का नहीं बल्कि पूरे जन समुदाय होता है।
3. लोक-साहित्य का उद्देश्य धन, यश, कीर्ति की प्राप्ति नहीं होती बालिक यह जन सामान्य के सहज हृदय की साहित्यिक प्रतिफलन है।
4. लोक-साहित्य गद्य-पद्य मिलित चंपू काठ्य है।
5. लोक-साहित्य में काव्य शास्त्र के नियमों- रस, छंद, अलंकार, शब्द शक्ति आदि काव्यांगों का कोई बंधन नहीं होता है।
6. लोक-साहित्य कला एवं संस्कृति से सम्पर्क बनाए रखने का महत्वपूर्ण स्रोत है।
7. लोक-साहित्य की प्रवृति सरल, सरस, सुबोध और स्वाभाविकता है।
8. मुख्य धारा से पृथक वर्ग का इतिहास समझने के लिए लोक-साहित्य महत्वपूर्ण भूमिका अदा करती है।
9. लोक-साहित्य का क्षेत्र अत्यंत व्यापक है जिसमे जन्म से, मृत्यु तक के विभिन्न आयाम समाहित है।.
10. लोक-साहित्य मानवीय मूल्यों का परिपोषक है जौ समाज को एकता के सुत्र में बांधे रखता है।
→ वर्गीकरण : विभिन्न विद्वानों द्वारा भिन्न-भिन्न आधारों पर लोक साहित्य का वर्गकिरण किया गया है।
* डॉ० सत्येंद्र के अनुसार लोक साहित्य के 2 भाग है-
- लोकवार्ता साहित्य
- वाणी-विलास
* डॉ० नरेंद्र प्रसाद वर्मा ने लोक साहित्य को 3 भागों में बांटा है-
- कला
- गीत
- लघु वार्ताएं
* डॉ० कृष्णदेव उपाध्याय ने लोक साहित्य के 5 वर्ग बताए है-
- लोकगीत
- लोक गाथा
- लोक काव्य
- लोक नाट्य
- लोक सुभाषित/प्रकीर्ण ( मुहावरे, लोकोक्तियाँ, पहेलियाँ)
अधिकांश विद्वानों ने इन पाँच वर्गो को ही स्वीकार किया हैं। जैसे- डॉ० कृष्षणलाल, डॉ० श्रीराम शर्मा, दिवाकर, गंगाधर आदि।
* अध्ययन की दृष्टिकोण से लोक साहित्य को निम्नोक्त उपखंडों में विभाजित किया गया है:-
- लोक गीत (Folk song)
- लोक नाट्य (Folk theater/o -(doroma)
- लोक कथा (Folktale)
- लोक गाथा (Folklore)
- लोक नृत्य-नाट्य (Folk dance-drama
- लोक संगीत (Folk Music)
1. लोक गीत :
जन सामान्य द्वारा विभिन्न अवसरों पर गाए जाने वाले गीत लोक गीत कहलाते है। लोकगीतों को 7 भागों में बाँटा गया है।
- संस्कार गीत (तेहर, मुण्डन, यज्ञोपवित, विवाह, मृत्यु शोकगीते
- ऋतु गीत (चैता. कजरी, होली, बारह मासा) व्रत गीत (छठ, तीज, गोधन पिड़िया, बहुरा)
- जाति गीत (पचरा, कहरवा धोबियतू, बिरहां)
- देवता गीत (शीतला, दुर्गा, शिव, राम, कृष्ण, कुल देरी गीत),
- श्रम गीत (शेपनी, सोहनी, जंतसार गीत)
- अन्य गीत (झूमरी, निर्गुण गीत, लचारी, पालने के गीत।
2. लोक नाट्य :
लोक द्वारा अभिनय के माध्यम से की गई अभिनंजना लोक नाट्य कहलाती है। यह नाटक सरल, भाषा में, छोटे कथानक के साथ, संगीतात्मकता की मधुरता, विदूषक के क्रियाकलापों तथा अंक के अभाव में सहजता से लोक तत्वों को समेटे रहता है। तमाशा, नौटंकी भांड, रामलीला, विदेशिया।
3. लोक कथा :
डॉ० सत्येन्द्र – * लोक, में प्रचलित और परंपरा से चली आ रहीं मूलतः मौखिक रूप में प्रचलित कहानियाँ लोक कथा कहलाती है।
- व्रतकथा,
- परिकथा,
- नाग – कथा,
- कथा रूढ़ियाँ
4. लोक गाना :
लोक द्वारा प्रचलित लोक नायक की वीरताप्रद प्रेम कथात्मक विवरण या अन्य प्रेरणाप्रद कथाएँ लोड गाना कहलाती है। जैसे – आल्हा – ऊदल, लोरिकायन, सोरठी, जयमयंक – जसचंद्रिका, नयकवा बंजारा, राजा भरथरी, राजा गोपीचंद इत्यादि।
5. लोक सुभाषित:
लोग प्रचलित मुहावरे, लोकोक्तियां, शक्तियां, पहेलियां, खेल के गीत अरि सुभाषित कहलाते है।
* लोक साहित्य के अध्ययन की प्रक्रिया :
1. ऐतिहासिक दृष्टिकोण से
2. मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण की प्रक्रिया
3. भाषा-वैज्ञानिक दृष्टिकोण की प्रक्रिया
4. धार्मिक दृष्टिकोण की प्रक्रिया
5. समाजिक दृष्टिकोण की प्रक्रिया
6. मानव-सांस्कृतित दृष्टिकोण की प्रक्रिया
7. आर्थिक दृष्टिकोण से अध्ययन
8. भौगोलिक दृष्टिकोण की प्रक्रिया
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