हीन भएँ जल मीन अधीन…

हीन भएँ जल मीन अधीन, कहा कछु मो अकुलानि समानै।
नीर-सनेही को लाय कलंक निरास है कायर त्यागत प्रानै।
प्रीति की रीति सु क्यों समुझे जड़, मीत के पानि परे कों प्रमानै।
या तन की जु दसा, घनआनंद जीव की जीवनि जान ही जानै ।। ४ ।।
संदर्भ:- प्रस्तुत पद्यांश कवि धनानन्द द्वारा रचित कवित है।
प्रसंग:- प्रस्तुत पद्यांश में कान का यह कथन है कि प्रेम की सत्यता वह है जहाँ प्रेमी, प्रिय के वियोग की पीड़ा और वेदना को सहे उससे बचने का मार्ग ना ढूंढे।
प्रसंग-व्याख्या:- कवि कहते है कि मछली जल के अधीन रहती। वह उससे अलग होकर तड़पने लगती है और मर जाती है। मछली जल के वियोग में तड़पकर मर जाने से वह अपने निहूर प्रिय (जल) पर कलंक लगा देती है। आदर्श प्रेमी तो वह है जो प्रिय के विरह की वेदना को सहे, तड़पने और प्राण देने वाले प्रेम की रीति को क्या समझेोगे?
वे तो प्राण त्यागकर अपने प्रिय पर लांछन लगा देते हैं। वे अपने सिन के बिना नही जी सकते, यह उनके मर जाने से सिद्ध हो जाता है, प्ररन्तु क्या ते अपने प्रिय से प्रेम मी करते हैं। यह सिद्धू नहीं होता है। धनानन्द कहते है कि मेरे मन की दशा और जीवन की स्थिति सुजान ही जान सकती है|
विशेष:-
शिल्प – पक्ष:-
1. भाषा -ब्रजभाषा
2. रस – श्रृंगार
3. काण्य गुण – माधुर्य
4. शब्द – शक्ति लक्षणा
5. अलंकार – अनुप्रास, उपमा, यमक, विशेषक्ति
४. शैली – मुक्तक
7. छंद – सवैया
भाव पक्ष:-
1. विरह की मार्मिकता को उजागर करने के लिए पानी – मछली का परम्परागत उदाहरण प्रसुत किया गया है।
2. ‘मीत के पानी परै’ मुहावरा अत्यंत सजीव वन पड़ा है।
3. एक सच्चा प्रेमी कापुरूष या कायर नहीं होता बल्कि वह सहिष्णु और साहसी होता है।
भाव साम्य:-
“मीरा विरह की अग्नि जैसी अग्नि नहीं। न जीने रेती न ही मरने देती। बस एक तड़प मीन जैसी होती है….।”

मीत सुजान अनीति करौ जिन, हा हा न हूजियै मोहि अमोही।
दीटि कौं और कहूँ नहीं ठौर, फिरी दृग रावरे रूप की दोही।
एक बिसास की टेक गहै लगि आस रहे बसि प्रान-बटोही।
हौ घनआनंद जीवन मूल दई! कित प्यासनि मारत मोही ।। ५ ।।
⇒ संदर्भ:- आलोच्य अंश मुक्त काव्य धारा के प्रतिनिधि व मूर्धन्य कवि ‘प्रेम के पीर’ रसमूर्ति धनानंद के सुजानहित से अवतरित है।
प्रसंग:- उक्त पद में रीतिकाल के विलक्षण कवि धनानंद अपने निष्ठुर प्रेयसी की उपेक्षा से व्याकुल होकर उससे याचना करते है कि वह अपनी प्रेम-संजीवनी प्रदान करे।
व्याख्या:- प्रेयसी की निष्ठुर से व्यथित धनानंद हाहाकार करते हुए कहते है कि है! मेरे मीत, सुजान। आप मोहित करके अमोटी न बनो। आप मेरे साथ ऐसी अनीति क्यों कर रहे हो? मैं आपसे प्रार्थना कर रहा हूँ कि पहले मुझे अपने रूप पर मुग्ध करके, अब इतने निष्ठुर मत बनो। मेरी आँखो के लिए आपके अतिरिक्त और कोई दूसरा स्थान या व्यक्ति नहीं है
।
मेरे नेत्र तो आपके सौंदर्य की दुहाई सुनकर ही आप पर मुग्ध है। मुझे पूरा विश्वास है कि आप मुझ पर कृपा करोगी और इसी आशा पर मेरे प्राणरूपी शरीर में अबतक मेरे प्राण टिके हुए है, अन्यथा यह कब के निकल गए होते। घन हो, जिसमें जीवन का आधार जल भरा है फिर मुझे इस प्रकार प्यासा क्यों मार रहे हो? अपना प्रेम जल बरसाकर मेरे प्यासे-प्यास प्राण-बटोही की रक्षा करों।
विशेष:-
शिल्प सौंदर्भ :
1. भाषा- ब्रजभाषा
2. छंद – सवैया
3. रस -श्रृंगार
4. अलंकार – अनुप्रास, श्लेष (घन आनंद, जीमन मूल), यमक (प्रान् बटोही)
5. शब्द शक्ति – लक्षणा
6. काव्य गुण – माधुर्य
7. शैली – मुक्तक
भाव सौंदर्य :
1. निष्ठुर प्रेयसी से अन्याय न करने की याचना
2. आनंद छन और जीवन मूल जैसा प्रिय होते हुए भी प्रेमी काया मरे, उससे बढ़कर और क्या अन्याय हो सकता है।
3. आलंभ की शैली अत्यंत याचनापूर्ण है।

प्रितम सुजान मेरे हित के निधान, कहौ
कैसे रहैं प्रान जो अनखि अरसायहौ।
तुम तौ उदार दीन हीन आनि परयौ द्वार,
सुनियै पुकार याहि कौ लौं तरसायहौ ।
चातिक है रावरो, अनोखो मोह-आवरो,
सुजान-रूप-बावरो, बदन दरसायहौ।
बिरह नसाय, दया हिय में बसाय, आय
हाय ! कब आनंद को घन बरसाय हौ ।। ६ ।।
⇒ संदर्भ : आलोच्य पद सनिसह काव्यधारा के प्रतिनिधि व मूछन्द कवि रसपूर्ति और प्रेम के पीर कहलाने वाले धनानंद के सुजानहित से उद्घृत है।
प्रसंग : रीतिकाल के विलक्षण कवि धनानंद अपने चातक समान व्याकुल प्रेमी-मन की अभिलासा को मुखरित करते हुए अपने जीवन – आधार प्रेयसी से निष्ठुरता न करने की विनती करते हैं।
व्याख्या : धनानंद अपनी प्रेयसी से याचना करते हुए कहते है है मेरे प्रेम आधार सुजान ! यदि तुम इस प्रकार छठ पर भी रहोगे तो मेरे प्राण कैसे रह पाएँगे?
है प्रियतमे ! तुम तो बड़ी उदार स्वभाव वाली हो और मैं हर प्रकार से दीन-हीन हूँ इसलिए तुम्हारी प्रेम-पूर्ण दृष्टि के प्रभाव से अपनी दीन-हीनता दूर करने की इच्छा लेकर तुम्हारे द्वार पर आ रहा हूँ। कब तक मेरे प्रति निष्ठुर बनकर मुझे सताती और तरसाती रहोगी, अब दया करके मेरे विरही मन की पुकर सुन लो।
मेरा यह चातक रूपी प्रेमी मन तुम्हारे विलक्षण खाति नक्षत्रिय घन (बादल) रूपी प्रेम के लिए तरसता रहता है। अपने विलक्षण सौंदर्य की झलक इस प्यासे चातक को अवश्य दिया है। उसे (प्रेम वर्षा) पाने के लिए, तुम्हारे दीदार के लिए कबसे ये व्याकुल होकर तड़प और तरस रहा है।
विशेष:-
शिल्प पक्ष :
1. भाषा – व्रजभाषा
2. र – श्रृंगार
3. काव्य गुण- माधुर्य
५. शब्द शक्ति – लक्षणा
5. अलंकार – रूपक, उपमा, उदाहरण और अनुप्रास
6. छंद – कवित
१. शैली – मुक्तक
भाव पक्ष :
1. प्रेमीजन की विरह जन्म हीनता का भाव द्रष्टय है।
2. विनती, भरा स्वर उल्लेख्य है।
3. इस पद का अध्यात्मपरक था शक्तिपरक अर्थ भी सुलभ है।
4. चातक का परम्परागत उदाहरण उल्लेख्य है।
5. संगीतात्मकता की घटा दृष्टव्य है।
“हीन भएँ जल मीन अधीन…” घनानंद द्वारा रचित इस प्रकार के और अन्य पद्य तथा उनके व्याख्या को पढ़ने के लिए हमारी स्पेशल कैटेगरी ‘घनानंद‘ को देखे। किसी भी प्रकार के सहयोग, प्रश्न अथवा सुझाव के लिए हमारे साथ व्हाट्सएप चैनल के माध्यम से हमसे जुड़े। धन्यवाद!
