1.अति सूधो सनेह को मारग है…”
छंद वर्णन:-
अति सूधो सनेह को मारग है जहाँ नेकु सयानप बाँक नहीं।
तहाँ साँचे चलें जित आपनपौ झझकैं कपटी जो निसाँक नहीं।
घनआनंद प्यारे सुजान सुनौ यहाँ एक ते दूसरों आँक नहीं।
तुम कौन धौ पाटी पढ़े हौ कहौ मन लेहु पै देहु छटाँक नहीं ।। १० ।।
संदर्भ : आलोच्य अंश रीतिकाल के रीति मुक्त धारा के प्रतिनिधि एवं सर्वश्रेष्ठ कवि हेम की पीर के अमर गायक धनानंद के सुजानहित से उद्धृत है।
प्रसंग : उक्त अंश में धनानंद अपनी निष्ठुर प्रेयसी को उपालंभ देते हुए प्रेम मार्ग की सरलता और निश्छलता का वर्णन करते है।
व्याख्या : धनानंद कहते है कि प्रेम का मार्ग अत्यंत सरल औरसीधा है। इसमें टेढ़ेपन अर्थात् चतुराई के लिए कोई स्थान शेष नहीं है। जिसके हृदय में थोड़ा सा भी छल-कपट है वे इस मार्ग पर निडर या निसंकोच होकर नहीं चल पाते है। प्रेम. मार्ग केवल सच्चे लोगो के लिए है जो अपना ‘स्व’ अर्थात् अहंभाव त्यागकर अपना सर्वस्व न्यौछावर कर देते है।
“सीस उत्तारै हाथ सौं, तब पैठे घर मारीं।” धनानंद सुजान को संबोधित करते हुए कहते है कि सच्चा प्रेमी कभी विचलित नहीं होता है। वह अपने प्रेम की एकनिष्ठता को निरूपित करते हुए कहते है कि मेरे लिए तो प्रियतम के रूप में केवल तुम्हारा अस्तित्व है, किंतु न जाते है निष्ठुर और निर्दली प्रियम तुमने किस पाठशाला से शिक्षा ग्रहण की है। तुम लेना तो मनभर (५० सेर) चाहती हो परंतु देने के लिए एक छटाँक (सेर का 10वाँ भागा भी तैयार नहीं हो।
विशेष :
1. भाषा – ब्रजभाषा
2. छंद – सबैया
3. अलंकार – श्लेष, यमक, रूपक सौर अनुप्रास
4. शब्द शमि – मंजना
5. रस- श्रृंगार
6. काव्य गुण – प्रसाद
7. शैली – मुक्तक
8. प्रेम के पक में बुद्धि, तर्कशीलता और चतुराई के लिए कोई स्थान नहीं है।
9. प्रेम के वास्तविक रूप का निरुपण बड़े सुंदर ढंग से किया गया है।
10. मुहावरे का प्रयोग हुआ है – “एकतें दूसरी आँक नहीं, तुम चैन सै पारी पढ़े रौ, मन लेहु पैदेहू छटाँक नहीं।
प्रेम में सरलता, सहजता, निष्कपरता (निश्छलता) और एकनिष्ठता की अपरिहार्यता ।
भाव – साम्य :
” जहाँ प्रेम तहँ नेम नहि, तहाँ न बुद्धि व्योहार।
प्रेम-मगन जब मन भया, कौन गिनै तिथि बार ॥” कबीर दास
– प्रेम पियाला जो पिये शीश दक्षिणा देय |
लोभी शीग न दे सके, नाम प्रेम का लेक ॥” कबीर दास
“प्रेम चतुर मनुस्य के लिए नहीं, वह तो शिशु
से सरल हृदयों की वस्तु है।” जयशंकर प्रसाद

2.
रावरे
रूप की रीति अनुप … “
रावरे रूप की रीत अनूप, नयो नयो लागत ज्यौं ज्यों निहारियै।
त्यौं इन आँखिन बानि अनोखी, अघानि कहूँ नहिं आनि तिहारियै।
एक ही जीव हुतौ सुतौ वार्यो, सुजान, सकोच औ सोच सहारियै।
रोकी रहै न, दहै, घनआनंद बावरी रीझ के हाथनि हारियै ।। ७ ।।
संदर्भ : आलोच्च अंश रीतिकाल के रीति मुक्त परम्परा के प्रतिनिधि एवं सर्वश्रेष्ठ कवि प्रेम की पीर के अमर गायक धनानंद के सुजानहित से उद्धृत है।
प्रसंग : उक्त अंश में धनानंद ने अपनी मोहित स्थिति का वर्णन किया है। धनानंद ने अपनी प्रेयसी सुजान के विलक्षण और भित परिवर्तनगरीष्ट रूप सौंदर्य का चित्रण किया है।
व्याख्या: धनानंद अपनी प्रियतमा का सौंदर्भ वर्णन करते हुए कहते है कि उनकी रूप की रीति बड़ी अनोखी है। इसे ज्यों-ज्यों के देखते है त्यों-त्यों एक नव्य साँदर्भ प्रतिभासित होता हुआ दिखाई देता है। यानि सुजान का रूप सौंद क्षण-क्षण परिवर्तनशील है। धनानंद अपनी विवशता व्यक्त करते हुए कहते हैं कि उनके नेत्रों की बानगी कुछ ऐसी है कि उनकी प्यास कही और नहीं बुझती है। उन्हें सुजान के अतिरिक्त और किसी को देखना भी नहीं भाता है, यह प्रेम का अनिवार्य शर्त है।
सुजान के प्रति अपनी अनुरूक्ति और एकनिष्ठता वे कहते है कि एक जीन के लिए उसके प्राण से अधिक मूल्यवान दूसरी कोई वस्तु नहीं है, परंतु उन्होने निःसंकोच रूप से उसे भी सुजान पर न्यौछावर कर दिया है। उनका मन उनके नियंत्रण में नहीं है। अर्थात धनानंद सुजांन के प्रति एकनिष्ठ एवं पूर्ण समर्पित है, उनकी वृद्धि का एकमात्र साधन सुजान का विलक्षण रूप सौदर्द है। उन्होंने बहुत प्रयत्न किया अपने मन को समझाने का किंतु अपनी रीझ के हाथों सब कुछ हार गए है।
मुख्यतः उपर्युक्त पद के माध्यम से घनानंद अपने प्रेम की एकाग्रता, सात्विकता और त्याग भाव को सिद्ध करते हुए सुजान के सौंदर्य को चरम पराकाष्ठ तक पहुंचा हुआ सिद्ध करते हैं।
विशेष :
1. भाषा – बजभाषा
2. रस – श्रृंगार रस
3. छंद – सबैया
4. अलंकार – अनुप्रास, पुनरुक्ति, विरोधाभास तथा उदाहरण अलंकार
5. शब्द शक्ति – लक्षणा
6. काल गुण – माधुर्य
7. शैली – मुक्तक
8. नालिका के अनुपम रूप सौदर्य का वर्णन
9. प्रियतमा का सौंदर्य नितनूतन अति परिवर्तनशील व विलक्षण है
10. प्रेम में एकनिष्ठता और समर्पण की अभिव्यक्ति
11. बाह्य सौंदर्य अधिक समय तक नहीं रहता और जो कमि आकर्षित करता है वह अपने प्रिय पात्र के आभ्यंतरीन सौदर्भ के लक्षण होते हैं।
“भाव साम्य: लिखन बैठ जाकी सबी गहि गहि गरख गरूर ।
भए न केते जगत के चतुर चितेरे कूर ।।”

3. झलक अति सुंदर आनन गौर…”
झलकै अति सुन्दर आनन गौर, छके दृग राजत काननि छवै।
हँसि बोलनि से जवि-फूलन की बरषा, उर-ऊपर जाति है ह्वै।
लट लोल कपोल कलोल करै, कल कंठ बनी जलजावलि द्वै।
अंग-अंग तरंग उठै दुति की, परिहै मनौ रूप बै धर च्वै ।। १ ।।
संदर्भ : आलोच्च पद रीतिकाल के रीतिमुक्त काय धारा के प्रतिनिधि व मूर्धन्य कवि रसमूर्ति धनानंद के सुजानाहित’ से उद्धृत है।
प्रसंग : उक्त पद में रीतिकाल के विलक्षण, प्रेमानुभूति के स्वच्छंद कवि धनानंद अपने प्रियतमा की मुस्कान, माधुर बानी और ललक उक्त मुद्धा की स्मृति का सौंदर्य चित्रण करते है जिसका साक्षात्कार कर प्रिय (नायक) बेद हो जाता है।
व्याख्या : नायिका सुजान का गोरा मुखड़ा दीप्तिमान है, उसके विशाल नेत्र कानों को छू रहे है। जब हंसती हुई बाते करती है तो लगता है कि पुषों की वर्षा सीधे कदम पर हो रही है अति उसकी वाणी अत्यंत मीठी है। जब वह बोलती है तो शरीर के हिलने से उसके लंबे बाल उसने गालों पर आकर मानो खेलने लगते हैं और साथ ही सान गले में शोषित दो लड़ी की मालाएं भी हिलने लगती हैं ऐसे में नायिका अद्भुत सौंदर्भ निखर कर सामने आता है। नामिका के अंग प्रलंग में साँदर्भ की लहरें उठ रही हैं, ऐसा लगता है मानो कि उसका सौंदर्य अब पृथ्वी पर गिर पड़ेगा।
अपनी नायिका सुजान के इस अद्भुत रूप सौंदर्य पर धनानंद मुग्ध हो जाते हैं।
विशेष :
कलापक्ष:
1. भाषा – बजभाषा
2. रस – श्रृंगार
3. काव्य गुण माधुर्य
५० शब्द शक्ति-लक्षणा
5. अलंकार – अनुप्रास, उत्प्रेक्षा
6. बिंब – दृश्य
7. शैली – मुक्तक
8. छंद – सवैया
भाव पक्ष :
1. रूप सौंदर्य का अद्भुत चित्रण।
2. घनानंद के सौदर्य चित्रण में भी एक गरिमा है, जो पाठकों को रस विभोर कर देता है।
3. संयोग श्रृंगार का सर्वश्रेष्ठ उदाहरण
भाव – साम्य :
धनानंद का रूप वर्णन बिहारी और जायसी के रूप-वर्णन के समकक्ष है।
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