गहन है या अंधकार
सूर्यकांत त्रिपाठी “निराला
गहन है यह अंधकारा;
स्वार्थ के अवगुंठनों से
हुआ है लुंठन हमारा।
खड़ी है दीवार जड़ की घेरकर,
बोलते है लोग ज्यों मुँह फेरकर
इस गगन में नहीं दिनकर;
नही शशधर, नही तारा।
कल्पना का ही अपार समुद्र यह,
गरजता है घेरकर तनु, रुद्र यह,
कुछ नही आता समझ में
कहाँ है श्यामल किनारा।
प्रिय मुझे वह चेतना दो देह की,
याद जिससे रहे वंचित गेह की,
खोजता फिरता न पाता हुआ,
मेरा हृदय हारा।
“गहन है या अंधकार” कविता का सारांश
सूर्यकांत त्रिपाठी द्वारा रचित “गहन है या अंधकार” द्वारा कवि ने मानव जीवन में फैली संवेदनशीलता, स्वार्थ और अज्ञानता के कारण उत्पन्न होने वाली मानसिक और सामाजिक अंधकार की व्याख्या की है। इस कविता में कवि ने प्रतीकात्मक भाषा का उपयोग करते हुए उन्होंने आज के समाज के दुखद स्थिति की व्याख्या की है उसके साथ ही कवि के उससे मुक्ति पाने की आकांक्षा भी प्रकट की है।
सूर्यकांत त्रिपाठी द्वारा रचित “गहन है या अंधकार” में कवि कहते है कि चारों ओर गहरा अंधकार छाया हुआ है। यह अंधकार प्राकृतिक न हो कर मनुष्यों द्वारा बनाई गई संकीर्ण सोच और स्वार्थ का परिणाम है। स्वार्थ के आवरण ने मनुष्य के हृदय और बुद्धि को इस प्रकार ढका है कि वह मानवता और सत्य का मार्ग भूल गया है। अब मनुष्य सिर्फ अपनी हित की चिंता करता है ना कि दूसरों के सुख दुख की।
सूर्यकांत त्रिपाठी द्वारा रचित “गहन है या अंधकार” में कवि कहते है जड़ता और अज्ञानता की मजबूत दीवार समाज को चारों ओर से घेरे हुए है। आज कल लोग एक दूसरे से मुंह फेरकर बात करते है जिसका अर्थ हैं आजकल लोगों के मन से प्रेम, विश्वास और आत्मीयता समाप्त हो गया है अब समाज में ऐसी स्थिति आ गई है जहां न कोई किसी की सहायता करता है और न ही चिंता करता है। ऐसी अंधकारमय स्थिति में ज्ञान का सूर्य, शांति का चंद्रमा और आशा के तारे कही दिखाई नहीं देती है। चारों ओर सिर्फ निराशा और भ्रम है।
इसके बाद सूर्यकांत त्रिपाठी द्वारा रचित “गहन है या अंधकार” में कवि अपने मानसिक स्थिति का वर्णन करते है। कवि कहते है कि कल्पनाओं का एक विशाल समुद्र कवि के चारों ओर गरज रहा है। कवि इसी समुद्र में भटक रहा है और उसे कही से भी सुरक्षिक किनारा नहीं मिल रहा है।
यह स्थिति किसी मनुष्य के जीवन में उत्पन्न भ्रम, असमंजस और दिशाहीनता का प्रतीक है। कवि को यह समझ नहीं आ रहा है कि कौनसा मार्ग सही है और उसे कहा जाना चाहिए।
कविता के अंतिम पंक्तियों के कवि ईश्वर से यह प्रार्थना करते है कि ईश्वर उन्हें इतनी चेतना और आत्मज्ञान प्रदान करे कि वह सांसारिक चेतना और मोहमाया से ऊपर उठ सके। कवि ऐसी शक्ति चाहता है जो उसे अपने वास्तविक कर्तव्य और जीवन के उद्देश्य का बोध करा सके। कवि अपने जीवन में आध्यात्मिक प्रकाश और जागृति की कामना करता है क्योंकि उसका हृदय सत्य और शांति की खोज में भटकते भटकते थक गया था।
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