Author: Puja Gupta

होली का उपहार मैकूलाल अमरकान्त के घर शतरंज खेलने आये तो देखा, वह कहीं बाहर जाने की तैयारी कर रहे हैं। पूछा – कहीं बाहर की तैयारी कर रहे हो क्या भाई ? फुरसत हो, तो आओ, आज दो – चार बाजियां हो जायें। अमरकान्त ने सन्दूक में आईना – कंघी रखते हुए कहा – नहीं भाई, आज तो बिलकुल फुरसत नहीं है। कल जरा ससुराल जा रहा हूं। सामान – आमान ठीक कर रहा हूं। मैकू – तो आज ही से क्या तैयारी करने लगे ? चार कदम तो है। शायद पहली ही बार जा रहे हो ? अमर…

Read More

नशा (प्रेमचंद की प्रसिद्ध कहानी ) – Class 12 ईश्वरी एक बड़े जमींदार का लड़का था और मैं एक गरीब क्लर्क का, जिसके पास मेहनत-मजूरी के सिवा और कोई जायदाद न भी। हम दोनों में परस्पर बहसें होती रहती थीं। मैं जमींदारों की बुराई करता, उन्हें हिंसक पशु और खून चूसने वाली जोंक और वृक्षों की चोटी पर फूलने वाला बंझा कहता। वह जमींदारों का पक्ष लेता; पर स्वभावतः उसका पहलू कुछ कमजोर होता था, क्योंकि उसके पास जमींदारों के अनुकूल कोई दलील न थी। यह कहना कि सभी मनुष्य बराबर नहीं होते, छोटे-बड़े हमेशा होते रहते हैं और होते…

Read More

कहानी :- बूढ़ी काकी बुढ़ापा बहुधा बचपन का पुनरागमन हुआ करता है। बूढ़ी काकी में जिह्वास्वाद के सिवा और कोई चेष्टा शेष न थी और न अपने कष्टों की ओर आकर्षित करने का, रोने के अतिरिक्त कोई दूसरा सहारा ही। समस्त इन्द्रियाँ नेत्र, हाथ और पैर जवाब दे चुके थे! पृथ्वी पर पड़ी रहती और घर वाले कोई बात उनकी इच्छा के प्रतिकूल करते, भोजन का समय टल जाता या उसका परिणाम पूर्ण न होता, अथवा बाजार से कोई वस्तु आती और न मिलती तो ये रोने लगती थीं। उनका रोना-सिसकना साधारण रोना न था, वे गला फाड़-फाड़ कर रोती…

Read More

मैकू (प्रेमचंद की कहानी ) कादिर और मैकू ताड़ीखाने के सामने पहुंचे; तो वहां कांग्रेस के वालंटियर झंडा लिये खड़े नजर आये। दरवाजे के इधर-उधर हजारों दर्शक खड़े थे। शाम का वक्त था। इस वक्त गली में पियक्कड़ों के सिवा और कोई न आता था। भले आदमी इधर से निकलते झिझकते। पियक्कड़ों की छोटी-छोटी टोलियां आती-जाती रहती थीं। दो – चार वेश्याएं दुकान के सामने खड़ी नजर आती थीं। आज यह भीड़ – भाड़ देखकर मैकू ने कहा – बड़ी भीड़ है बे, कोई दो – तीन सौ आदमी होंगे। कादिर ने मुस्करा कर कहा – भीड़ देख कर डर…

Read More