लोक कथा
लोक कथा:- ‘लोक’ शब्द का अभिप्राय जन-सामान्य से है जो अभिजात्य संस्कार, शास्त्रीयता और पाण्डित्न की चेतना तथा अहंकार से शून्य है। इन लोक में प्रचलित कलाएँ लोक कला कहलाती है। लोक लोक कथा शब्द मोटे तौर पर लोक प्रचलित उन कथानकों के लिए व्यवहत होता है जो मौखिक-लिखित परंपरा से क्रमश: एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को प्राप्त होते रहें है।
डॉ० सत्येन्द्र के अनुसार- “लोक में प्रचलित और परंपरा से चली आ रही मूलतः मौखिक रूप में प्रचलित कहानियाँ लोक कथा कहलाती है।”
* लोक कथाओं की परंपरा अत्यंत प्राचीन है।
→ ऋगवेद में बहुत से ऐसें सूक्त है जिनमे दो या तीन पात्रों में कथोपकथन पाया जाता है, इन सूक्तों को संवाद – सूक्त करते है। इस संदर्भ में ऋगवेद में’ ऋषि शुनः -शेस का प्रसिद्ध आख्यान, अपाला-अत्रि के आदर्श नारी चरित्र, चयवन-भार्गव और सुकन्या मानवी की कथा आदि उपलब्ध है।
→ ब्राह्मण ग्रंथो में भी अनेक कथाएँ उपलब्ध होती है। उदाहरण स्वरूप ‘शतपथ’ ब्राह्मण’ में पुरूखा और उर्वशी की कथा अत्यंत प्रसिद्ध है जिसको लेकर महाकवि कालिदास ने विक्रमोर्वशी’ नाटक की रचना की है। शतपथ ब्राह्मण में ‘दध्यंग आथर्वण’ की कथा भी प्रसिद्ध है जिनका लोकप्रिय पौराणिक नाम दधीचि है जिनकी हड्डी को लेकर ब्रज का निर्माण किया गया था जिससे इंद्र ने वृत्तासुर का वध किया था।
→ ब्राह्मण ग्रंथो के पश्चात् उपनिषदों में भी अनेक गाथाओं का उल्लेख पाया जाता है। ‘नचिकेता’ की सुप्रसिद्ध कला ‘कठोपनिषद’ का प्रधान वर्ण्य-विषय है जिसने अपनी विलक्षण प्रतिभा से यम से अमर होने का साधन पूछा था। केनोपनिषद् में अग्नि और यज्ञ की कथा का वर्णन पाया जाता है।
वस्तुतः लोक कथाओं के जन्म की कहानी मनुष्य के जीवन यात्रा के साथ ही प्रारंभ हुई और हजारों-हजारों वर्षों के उसके सतत संघर्षशील पुरुषार्थ के उतार -चढ़ाव, उत्कर्ष – अपकार्ष, यश अपयश परक अनुभूतियों की सहचरी और साक्षी रही है। लोक लोक कथा विश्व व्याप्त है इसमे मानव के दुःख-सुख, रीति-रिवाज़, आस्था व विश्वास अभिव्यक्त होते रहें हैं। मूलतः मौखिक रूप में उपलब्द होने के कारण देश-काल एवं परिस्थितियों के अनुरूप इसमें रूपांतरण होते रहे हैं।
लोक लोक कथा के नियामक तत्व:– प्रत्येक रचना शील्प के कुछ नियामक तत्व होते है जिसके आधार पर उसकी विवेचना की जाती है। लोक कथा के नियामक तत्वं निम्नोक्त है:
1. लोक मानस:- लोक वाङ्मय का मूलाधार लोक मानस है। यह लोकानुभूति की आधार शीला तथा सम्पूर्ण लोकाभिनक्ति का मूल स्त्रोत है। लोक मानस की चेतना में नित नए विचारों का उद्रेक होता रहता है जिसमे वाङ्मय के विविध रूपों का सृजन होता है।
2. कला स्वरूप:- लोक कथा का अपना एक अलग स्वरूप होता है। वैसे लोक कथा का प्रारंभ तो जिज्ञासामूलक ही होता है किंतु आगे बढ़ने की शैली बहुआयामी हो जाती है। लोक कथाओं के कई स्वरूप होते है जैसा कि एक स्वरूप ऐसा होता है जिसमें कथा आरंभ होने पर उसके वक्ता द्वारा अपनी ओर से कुछ नई बातें जोड़ दी जाती है जिससे कथा में विस्तार के साथ ही साथ रोचकता और विविधता भी उत्पन्न हो जाती है।
कभी-कभी कथा का स्वरूप ऐसा होता है कि एक लोक कला जब आरंभ होती है तो कुछ दूर चलने पर एक दुसरी नई कथा भी उससे आ मिलती है फिर दूसरी कथा आ मिलती है फिर क्रमशः तीसरी और चौथी काथा भी सम्मिलित हो जाती है और कथाओं की श्रृंखला सी बन जाती है।
3. पात्र:- कोई भी कहानी बिना पात्रों के सृजित नहीं होती है। जब भी किसी लोक कथा का निर्माण किया जाता है तो उसके पात्रों में युग तथा स्थान के अनुरूप परिवर्तन कर लिया जाता है। लोक कथाएँ स्थानीय जीवन से जुड़ी होती है फलता इसके पात्रों में भी लोकाभिव्यक्ति की प्रधानता होती है।
4. कथानक रूढ़ि:- लोक कथा में कथातंतुओं का विशेष महत्व होता है जिसे अभिप्राय भी कहते है। किसी लोक कथा के कहानी तत्व में क्रिया – प्रतिक्रिया मूलक घटना विशिष्ट रूप से योजित की जाती है जिसे अभिप्राय कहा जाता है। इनमे मूलतः अद्भुत प्राणी जैसे- परिया, जादूगरनियां कुरविमाता, बोलते पशु-पक्षी, दैवीय लोक, असाधारण शारीरिक आदि सम्मिलित होते है।
5. वातावरण:- लोक कथा का अपना एक वातावरण होता है जिससे जुड़कर कहानी के विभिन्न पात्रों, घटनाओं तथा उद्गारिता का अपना एक स्थान बन जाता है। लोक कथा का वातावरण आभिजात्य संस्कारी का नहीं बल्कि लोकंचल तथा स्थानीय लोक संस्कारों का होता है। इसी लोक परिवेश में लोक कथा की मौलिक आभा छुपी होती है।
6. प्रयोजन:- प्रत्येक लोक कथा का एक उद्देश्य होता है।कोई भी लोक कथा जब सृजित होता है तब उसकी उपादेयता या प्रयोजनियता का अपना एक आधार होता है। वह देश-काल, आयु-वर्ग, पात्र या घटना के केंद्रित होते हुए भी किसी न किसी प्रयोजन से जुड़ा रोता है। लोक कथा का मूल उद्देश्य लोकानुरंजन तथा लोक कल्याण होता है।
* लोक कथाओं की विशेषताएँ:-
लोक कथाओं की सर्वप्रधान विशेषता है, उसका लोक से जुड़ा होना । लोक जीवन के नाना रंग एवं रेखाएं इन कला कहानियों के माध्यम से उद्धृत किए जाते रहे हैं। साहित्यिक कहानियों की भाँति इसमें सुनियोजना, सुव्यवस्था , गंतव्य दिशा आदि नहीं होता, इसका उद्देश्य मात्र मनोरंजन न होकर ज्ञान वर्धक और मानवीय संवेदनाओं का प्रकाशन होता है। इन कथाओं की कुछ आधारभूत विशेषताओं का अंकन इस प्रकार किया जा सकता है-
1. वक्ता और स्रोता का तादात्म्य: लोक कला की सबसे पहली प्राणवान विशेषता है – कथक्कड और श्रोतांहंद का अभुतपूर्व तादात्म्य का होना। लोक कथा के वक्ता की अनिवार्य शर्त यह, होती है कि श्रोता समयानुसार बीच-बीच में हाँ-ई, अच्छा, ऐसा!, अरे वाह!, हे राम ! अब क्या होगा? जैसे स्विकृति सूचक शब्दों का प्रयोग करें। यद्यपि इसका प्रयोग स्वैच्छिक तथा सहज में ही हो जाता है। यह प्रयत्नजनक नहीं होता। वास्तव मैं यह श्रोता की सक्रियता तथा कथा समझ आने का प्रतीक है।
2. आधारभूत मनोवृतियों का सहज अंकन: लोक कथाओं के विराट फलक पर मनुष्य की आधारभूत मनोवृत्तियों की सुंदर, स्वाभाविक तथा प्रभावशाली अभिव्यंजना सहज में हीं अंकित होती है। श्रृंगार, प्रेम, भय, विस्मय, आशा, उत्सार, वैराग्य, सुख-दुःख इत्यादि का निराशा, शत्रु से संघर्ष का उत्साह तथा सर्वजन सुखाए का हरित वाक्य इस लोक कथाओं की पवन स्थली में मंगलमई सरिता की तरह बहती रहती है।
3. सामाजिक संबंध-जन्य परिवेश: लोक कलाओं की दुनिया में सामाजिक संबंधो का अत्यंत ही मनमोहक व सजीव चित्रण मिलता है। यहाँ पति-पत्नी का हास-परिहास, माँ की ममता, विमाता की क्रूरता, भाई-बहन का निश्चल प्रेम, भाभी का ननद के प्रति इर्ष्या, कृतघ्न संतान, दुष्ट मंत्री, प्रजा वत्सल सम्राट, स्वामी भक्त सेवक, मुर्ख पति की बुद्धिमति पत्नी, विवेकी मित्र इत्यादि न जाने कितने ही पात्र लोक कथाओं की विचित्र दुनिया में संचरण करते हुए मिल जाएंगे।
4. जातीय चरित्र का वृहदकोष: समाज की के विभिन्न जातीय संगठनों की अपनी-अपनी मौलिक नीजता होती है। क्षत्रियों की तेजस्वीता, वैश्य वर्ण का बौद्धिक चातुर्य, ब्राह्मणों की सहिष्णुता, स्त्रियों की तेजस्विता,शूद्र का सेवा भाव वेद विख्यात है। लेकिन लोक कथाओं को इससे कोई लेना-देना नहीं है। वहाँ तो गाँव का पण्डित, सेठ, साहुकार, ठाकुर, नाई, किसान, नट, जाट, बनिया, कायस्थ आदि का जातीय
स्वभाव अभीष्ठ है। प्रत्येक जाति की अपनी-अपनी नीजता ही अनेकानेक लोकोक्तियों की जनक बन जाती है।
5. अश्लीलता का अभाव: लोककथाओं में कहीं भी अश्लील प्रेम का वर्णन नहीं मिलता, उसमे वर्णित प्रेम दिव्य, अलौकिक और आदर्श है।
6. आशावादी दृष्टिकोण: लोक कथाओं के पात्र परिश्रम, साहस और उत्साह के साथ कठिन से का कार्यो को करते हैं, बड़े से बड़े संकट का सामना करते है। वे भूत-प्रेत और राक्षसों से युद्ध करके उनसे जीतते है, भयावह जंगल उन्हें हतोत्साहित नहीं कर पाते। लोक कथा पाठकों को उत्साह, साहस और आशावादी दृष्टिकोण प्रदान करता है।
7. भाग्यवाद और कर्मवाद का समन्वय: लोक कथाएँ भारतीय संस्कृति को प्रस्तुत करती है जिसमे भाग्यवाद और कर्मवाद का समन्वय है। यहाँ भाग्य के समर्थन के साथे कर्म की उपेक्षा नहीं की गई है। भाग्य की पूर्णता के लिए कर्म को आवश्यक माना गया है।
8. प्रकृति चित्रण का बाहुल्य: लोक कथाओं का परिवेश ही प्रकृति है। लोक कथाओं में प्रकृति और मानव एकाकार हो गये हैं, वे आपस में हँसते-बोलते हैं और एक दूसरे के दुख में हाथ बंटाते है। इन कहानियों में तोता बोलता है, मोर नाचता है, सिंह न्याय करता है, हंस साक्ष्य देता है और मेघ रोता है।
9. उत्सुकता की भावना: लोक कथाओं में अद्भुत रस की प्रधानता के कारण श्रोताओं की जिज्ञासा आगे की कथा को जानने की बनी होती है।
10. व्यापकता: विश्व भर की लोक कथाओं में एक सी स्वाभाविकता होती है। इन कथाओं में एक सी समानता होती है। जो कहानियाँ भारतवर्ष में सुनी – सुनाई जाती है, वही कहानियाँ पात्रों के नामों में अन्तर से दूसरे देशों में कही जाती हैं। अतः लोक कथा लोक साहित्य का एक विशिष्ट रूप है जो नित-नूतन रूप धारण करके प्रस्तुत होती रही है।

* लोक कथा का वर्गकिरण:-
लोक-कथाओं का विषयफलक अत्यंत विस्तृत है। इसे विभाजन की सीमा रेखा में समेटना दुस्कर और जटिल समस्या है। एक ही कलावस्तु उद्देश्य आदि कारणों से एक से अधिक वर्गो में स्विकार किया जाता है। अध्ययन की सुविधा अनेक विद्वानों ने अपने-अपने दृष्टिकोण के अनुसार इसका वर्गीकरण किया है। समग्रतः यह परिकथा, व्रतकथा, प्रेम कथा, दंत कथा, मनोरंजक कथा, हास्य कथा, साधु-पीरों की कहांनी, कथारूढ़ि, नाग कथा, अंधविश्वास संबंधी कथा, धार्मिक कथा, नीति कथा आदि में वर्गीकृत है।
1.व्रत कथा : भारते धर्मपरायण देश है। यहाँ के प्रदेशों में मनोरंजन के साथ ही साथ धार्मिक प्रवृत्ति को जाग्रत करने और धर्म की श्रेष्ठता को प्रतिपादित करने वाली अनेक कथाएं प्रचलित है। धर्म के प्रति आस्था रखने वाले लोक समाज में व्रतों, त्योंहारों और अनुष्ठानों का विशेष और आदरणीय स्थान होता है। यहाँ सप्ताह के प्रत्येक दिन, माह की प्रत्येक तिथि और प्रत्येक माह कोई न कोई व्रत होता है।
यहाँ अनेक देवताओं और देवियों जैसे – वैदिक देव, कुल देवता, ग्राम देवता, क्षेत्र देवता, पंच देव, सप्त ऋषि देवता, कुल देवी, स्थान देवी, चौराहे की देवी, अंचल देवी आदि के साथ लोक देवता और नायकों की पूजा का भी प्रचलन है, जैसे राजस्तान के लोक देवता के रूप में गोगाजी, वीर तेजा जी, वीर कल्ला जी, जीण माता, राना बाई, शीतला माता आदि हैं। इन सभी देवी-देवताओं से जुड़ी लोक प्रचलित कथा-कहानियाँ व्रता कथा कहलाती है।
प्रत्येक वार की व्रत कथा, पूनम (पूर्णिमा) की व्रतकथा, एकादशी की व्रत कथा, प्रदोष, त्रयोदशी, अष्टमी, तीज, करवाचौथ, गणेश चतुर्थी, वैशाख मास, कार्तिक मास, सावन, अगहन की कथाएँ आदि श्रवसरानुकूल सुनी सुनाई जाती है। इन कथाओं में व्रत की पालन से श्रीवृद्धि व सुख, पालन की कमी से देव-विशेष का कोप, व्रत का महत्व और विधि-विधान का वर्णन होता है। ये उपदेशात्मक भी होते है जैसे सत्यनारायण व्रत कथा में सदा सत्य कहने की सीख और असत्य बोलने का दुष्परिणाम दर्शाया गया है।
इन व्रत कथाओं में जन-समाज की धर्म आस्था प्रधान जीवनशैली के दर्शन होते हैं। ये कथाएँ लोगो में एकता की परिचालक भी है क्योंकि ये कथाएँ सामान्यतः सामुहिक रूप से कही-सुनी जाती है। जैसे सत्य नारायण कथा को बंधु-बांधव सहित करने का बड़ा महत्व है। इन कथाओं के अंत में सर्वमंगल की भावना होती है।
व्रजमंगल में सत्यनारायण तथा गणेश जी की कथा का बड़ा प्रचार है। भोजपुरी प्रदेश में सत्यनारायण की कथा और त्रिलोकीनाथे की कथा घर-घर में प्रचलित है। भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी (अनंत चतुर्दशी। को अनंत भगवान की कथा सुनकर अनंत सूत्र धारण किया जाता है। बालिकाएँ अपने भाई की सुख् समृद्धि के लिए पिड़िया का व्रत करती है। कार्तिक के ग्राह द्वितीया से लेकर अगहन की शुक्ल दूज़ तक प्रतिदिन रात्रि और प्रातः पिड़िया व्रत कथा करती है फिर अन्न ग्रहण कर सकती है।
देवी-देवताओं के अतिरिक्त इन कथाओं में ग्रह, नाग, यक्ष, गंधर्व, ऋषि आदि की कथाएं भी आती है, उदाहरणतः शनि भगवान की कथा, सूर्य देव की कथा, ऋषि पंचमी पर ऋषि कथा, नाग कथा, कुबेर की कथा, पंचमी की कथा आदि। इन कथाओं का प्रयोजन लोक संस्कृति को जीवित रखना, परम्परा को बनाए रखना, धार्मिक आस्था की वृद्धि, समाज में मेल-मिलाप, लोगो को नैतिकता का ज्ञान देना और दिनचर्या के प्रति अनुशासन स्थापित करना है।
जैसे- सोमवार को शिव की पूजा, मंगलवार को हनुमान की पूजा होनी चाहिए, बुधवार को गृहत्याग करने यात्रा नहीं करनी चाहिए, गुरुवार को बाल काटने, नाखून काटने और बाल धोने का निषेध है, कुछ विशेष अवसरों पर घर खरीदने, बेचने, कर्ज देने-लेने, तामसिक भोजन करने, कुछ विशेष वस्तुओं का दान देने आदि का निषेक है। उपवास, खान-पान, हवन आदि की व्यवस्था करने थे कथाएँ स्वास्थ्य और पर्यावरण के प्रति भी लोगो में जागरूकता फैलाती है।
2.कथानक रुढ़ियाँ : लोककलाओं में कथानक रूढ़ियों का आशय कथानक निर्माण की विशेष शैलीगत विशेषताओं से है। कथानक रूढ़ि वास्तविकता, कल्पना अथवा संभावना पर आधारित ऐसी घटनाओं, कार्य- व्यापार था उस विचार को कहते हैं जो कथानक को आरंभ करता है, गति देता है या समान रूप देता है।
कथानक रूढ़ियों का प्रयोग प्रायः रोमांच, चमत्कार तथा पुराकालीन विंबो एवं वातावरण को उपस्थित करने के लिए किया जाता है। फलतः उनमें असंभव, असाधारण, अस्वाभाविक और कभी-कभी अलौकिक तत्वों का समावेश भी कर दिया जाता है। कथानक रूढ़ियों के मूल में संभावनाश्रित कल्पना ही प्रधान होती है।
उदाहरणार्थ -किसी राक्षस या यक्ष द्वारा नायक था नायिका को लेकर उड़ जाना एक संभावित दृश्य है। पक्षी जब छोटे-मोटे जीव को चोंच में लेकर उड़ सकता है तो पराशक्तिधारी राक्षस को नहीं? कम से कम इसकी संभावना तो है ही। ये रुढ़िया केवल हिन्दी साहित्य में ही नहीं बल्कि ग्रीक, लैटिन, फ्रेंच, जर्मन और अंग्रेजी में रचित साहसिक, रोमांटिक कथाओं में समान रूप से पाई जाती है।
3.कथानक एवं अभिप्राय : कथानक रूढ़ियां और ‘अभिप्राय दोनो एक दूसरे के पर्याय हैं। कथानक अभिप्राय, को कथानक रूढ़ि, नाम देने में तात्पर्य बस इतना है कि इससे भी स्पष्ट हो जाता है कि इसका प्रयोग पह परंपरा या चलन के आधार पर किया जाता रहा है।
लोक कथा मौखिक रूप से पीढ़ी दर पीढ़ी हस्तांतरित होती रहती है इसलिए कथानक तो वही रहता हैं मगर कथावाचक के अनुसार शैली बदलती रहती है। हर लोककथा के कथानक में एक विशेष तत्व होता है जो कोई, घटना, चरित्र, कथन या स्थान हो सकता है जिससे कहानी का मूल भाव व्यक्त होता है, उस स्थिर तत्व को ही ‘कंथानक अभिप्राय’ कहते है। अंग्रेजी में यह Motif (मोटिफ) कहलाता है।
श्यामचरण दुबे के अनुसार “कला का मूलभाव ही रूढ़ि या अभिप्राय है।”
कृष्णानंद गुप्त कथानक के मूल लक्षण को रूढ़ि या अभिप्राय कहते है।
लोक कथाओं में अभिप्राय को निम्नलिखित उदाहरणों द्वारा स्पष्ट किया जा सकता है:-
गधा – मूर्ख, गीदड़ और कौवा चालाक, ब्राह्मण – दरिद्र, राक्षस – क्रूर, गाय- मासूम । थे कुछ ऐसे अभिप्राय है जो भारतीय परंपरा में रूढ़ हो गए है। संसार भर की लोक कथाओं में इसी के द्वारा एकता अभिव्यक्त – की गई है। लोक कथाओं में अभिप्राय प्रयुक्त होते हुए जब रूढ़ चलन में परिवर्तित हो जाती है तब वह कथानक रूढ़ियों बन जाती है। कथानक का सर्वप्रथम अध्ययन अमेरिका के विद्वान ‘बलूम फील्ड’ द्वारा किया गया था।
4. परी-कथा : परियों की कहानियाँ अवसर बच्चों के लिए बनाई गई छोटी कहानियों होती हैं जिसमें जादुई जीव, लोग और स्थान शामिल होते हैं। सामान्यतः इसमें राजकुमार, राजकुमारी, कल्पित चुड़ैल मा राक्षय जैसे चरित्र होते है। अन्य प्रकार की कहानियों की तरह परियों की कहानी में भी एक शुरूआत, मध्य और अंत; नायक और विरोधी के संघर्ष और संकल्प शामिल होते है। हालांकि, परियों की कहानी में जादुई तत्व होते हैं, जैसे कि बात करने वाला जानवर या वस्तुएँ और एक मंत्रमुग्ध कर देने वाला सेटिंग (setting) जैसे कि दूर का राज्य या जंगल ।
परियों की कहानी अक्सर एक समय की बात थी” वाक्यांश से शुरू होती हैं और सुखद अंत के साथ समाप्त होती है। अच्छे चरित्र हमेशा बुरे चरित्र पर विजय प्राप्त करते है, सबक सिखाए जाते है। हमेशा एक खुशी का संकल्प किया जाता है। परियों की कहानियों फंतासी (Fantasy) भयावह कल्पना से भिन्न होती है,-क्योंकि वे मानते हैं कि जादुई पहलू सिर्फ चीजों का तरीका है, न कि कहानी में स्पष्ट हिस्सा परियों की कहांनी में अक्सर नैतिकता होती है, जबकि काल्पनिक कहनियों में हो भी सकती हैं और नहीं भी।
आज, परियों की कहानियाँ अभी भी मौखिक रूप में हैं, लेकिन आमतौर पर प्रकाशित कार्यों में और यहाँ तक की फिल्मों में भी बनाई जाती है। वे अक्सर सबक सिखाने और सभी उम्र के लोगों का मनोरंजन करने के लिए उपयोग किए जाते हैं। परी कथा शैली का अक्सर स्कूल में अध्ययन किया जाता है, और इसका उपयोग लिखित रूप में दृष्टिकोण सिखाने के लिए किया जा सकता हैं, जहाँ छात्रों के किसी अन्य चरित्र के दृष्टिकोण से एक लोकप्रिय कहानी को पुनः लिखने के लिए कहा जाता है, अक्सर कहानी नाटकीय रूप से बदल जाती है।
चूंकि परियों की कहानियों में अलग-अलग सेटिंग्स, पात्र और कथानक होते हैं, इसलिए उनका अध्ययन अक्सर पढ़ने की कक्षाओं में भी किया जाता है।
‘फेयरी टेल’ शब्द सर्वप्रकम फ्रांसीसी लेखिका मैडम डी सॉलनीय ने 1600 के दशक के अंत में किया था। कुछ परियों की कहानियाँ जैसे- ‘ब्यूरी एण्ड द बीस्ट’ और ‘रम्पल स्टिल्ट स्किन। 4000 साल से अर्थिक पुरानी मानी जाती है। इस शैली का अधिकांश हिस्सा मैखिक परंपरा में सदियों पहले से जीवित है जिनका सटीक इतिहास का पता लगाना मुश्किल है।
समय के साथ यह शैली विकसित होती चली गई जिसका अस्तित्व आज भी स्थिर है। ये आज भी सुनी-पढ़ी और लिखी जाती है, चलचित्रों ने इसके आयाम को और भी गति प्रदान की है। कुछ लोक प्रसिद्ध परिकथाएँ उसके उदाहरण है, यथा – सिंडरेला, रॉबिन, सौंदर्य और जानवर, जुनिपर ट्री, गायन कहुआ, बूट पहनने वाला बिल्ला, स्लीपिंग ब्यूटी और बर्फ की सफेद और सात बौने आदि।
(4) नागकथा : लोक कथा का तात्पर्य उन लोक प्रचलित कथाओं से है जो लोक समाज में पीढ़ी दर पीढ़ी चले आ रहे है और लोकानुरंजन के उद्देश्य से या विशेष अवसरों पर कहें-सुने जाते है। इन लोक कथाओं में व्रतकथा, परिकथा, अंधविश्वास या कल्पना पूर्ण कथाओं के साथ ही साथ नागकथाओं का भी विशेष महत्व है। नाग कथा का संबंध व्रतकथाओं और कपोल कल्पित कलाओं दोनों से ही है। भारतीय समाज में नाग का अपना पौराणिक महत्व और असतित्व रहा है।
पृथ्वी शेषनाग पर टिकी न हुई है, यह दंतकथा ही नहीं किंतु इसके पीछे लोगों की सदियों पुरानी आस्था है। समुद्रमंथन में’ मथानी बने नागराज, शिव के गले का आभूषण वासुकी नाग या भगवान विष्णु की शैया के रूप में शेषनाग सदा के लिए पूज्य है, और उनसे जुड़ी विविध कथाएँ जन मानस में सदा के लिए आस्था का केन्द्र रहेगी।
पौराणिक कथाओं में नागों को देवता और असुर दोनो के रूप में दिखाया गया है – वासुकी, शेषनाग, तक्षक, कर्कोटक, पिंगला आदि सर्प देवता स्वरूप में पूजनीय है वहीं भागवत में ‘कालिया-मर्दन प्रसंग में कालिया नाग का वर्णन मिलता है जिसके आतंक से सम्पूर्ण ब्रज मण्डल परेशान था, जिसका संहार भगवान श्री कृष्ण ने किया। नाग मानव से कम पुराना नहीं है, इस बात का प्रणाम सिंधु घाटी की सभ्यता से प्राप्त मानव और नाग के चित्र हैं।
भारतीय इतिहास में शिल्पकारों तथा लेखकों ने नागवंश को विविध रूपों से महिमा-मंडित किया है। उन्होंने नाग को मानवीय प्रतिरूप देने की कई कल्पनाएँ की, शरीर नर-नारी का तो धड़ नाग-नागिन का। इस क्रम में उन्होंने नाग संस्कृति मे मानव- संस्कृति से जोड़ने का प्रयास किया। फलता भारतीय लोक कथाओं में नाग जातियाँ, नागमणि, इच्छाधारी नागिन की प्रेम कथा, नाग-नागिन का प्रतिशोध, पनर्जन्म आदि की अनेक कथाएं सम्मिलित होती गई और आज भी लोक-कथाओं की घरोहर के रूप में स्थापित है।
आज, सावन महीने में नागपंचमी के दिन नागों की पूजा होती है, उन्हें दूध पिलाया जाता है, पूजा-अर्चना की जाती है और रक्षा की प्रार्थना की जाती है। बांग्ला लोक समाज में इस दिन से एक विशेष कथा जुड़ी हुई है जिसके नायक-नायिका लखिन्दर और बेहुला है। इस कथा का उद्देश्य नागों की देवी माता मनसा की महत्ता का प्रतिपादन करना था। यहपि, कल्पना की अधीकता इनमें होती है, परंतु इन लोक कथाओं द्वारा लोक समाज का वह आदर्श स्वरूप दिखता है जो विषैले सर्पों को भी मीठा दूध पिलाने की और सम्मान के सिंहासन पर विराजमान करने की पराकाष्ठा रखता है।
5. अंधविश्वास /लोक विश्वास : अंधविश्वास एक तर्कहीन मान्यता है जिसका आधार आलौकिक प्रभावों की मनघड़ंत व्याख्या है।
एक छोटा बच्चा अपने घर, परिवार एवं समाज में जिन मान्यताओं को बचपन से देखता एवं सुनता आ रहा होता है, वह उन्हीं का अक्षरशः पालन करने लग जाता है, उसके मन-मस्तिस्क में इतना गहरा असर होता है कि वह जीवनभर उन अंधविश्वासो से मुक्त नहीं हो पाता।
वह उन्हीं सच्चाई और वास्तविकता से बहुत दूर होते है। ये प्रकृति के नियमों और वैज्ञानिक आधार दोनों से ही बाहर होते है। अंधविश्वास व्यक्ति के तर्क क्षमता और मानसिकता को पूरी तरह नष्ट कर देता है।
एडमंड बर्क के अनुसार ‘अंधविश्वास कमजोर दिमाग वालों का धर्म है।’
ग्राम्य या लोक समाज में सामान्यतः शिक्षा का अभाव होता है। शिक्षा और तर्क के अभाव में लोक समाज असंख्य अंधविश्वासों से ग्रस्त हैं। उनमें से कुछ निम्नलिखित है-
1. बिल्ली का रास्ता काटना अशुभ होना ।
2. कुत्ता या बिल्ली का रोना मृत्यु या किसी अनहोनी का संकेत है।
3. पालतू कुत्ते के रोने की सूचना या भोजन त्याग देने से घर पर संकट।
4. जाते समय पीछे से टोकना एक अपशगुन है।
5. बाँस जलाने से वंश नष्ट होता है।
6. मंगलवार, शनिवार और गुरुवार को नाखून और बाल काटने से ग्रहदोष होता है।
7. झाड़ू खड़ा रखने से घर में कलह होता है या संध्याकाल में झाड़ू लगाने से लक्ष्मी चली जाती है।
8. गुरुवार को पूछा नहीं लगाना चाहिए। गुरुवार के अलावा रोज पोंछा लगाना चाहिए।
9. नमक मिले पानी से पीछा लगाने से नाकारात्मकता, समाप्त हो जाती है।
10. सुनसान रास्ते या चौराहे पर पेशाब करने करने से भूत-प्रेत पीछे लग जाते हैं।
11. संकट निवारण या मनोकामना प्राप्ति के लिए टोना – टोटका, तंत्र साधना, वशीकरण, मारण, उच्चादन, मूठकरनी, बंधन, भूत-प्रेत, पीर आदि का सहारा लेना।
12. घर, दूकान के दरवाजों पर नींबू-मिर्च का लगाना नजरबट्टू।
13. ताबीज और झाड़-फूंक से भूत उताड़ना, बीमारी का इलाज करना, साँप का जहर उतारला, दर्द निवारण करना।
14. अंगूठी द्वारा ग्रहों को अनुकूल करना।”
15. जूते-चप्पल उल्टे रखने पर कलह होना।
16. शनिवार को मंदिर में जूते-चप्पल छोड़ आने से शनि समाप्त हो जाता है।
17. सुबह का सपना सच होता है।
18. नदी में सिक्का फेकना भाग्य के लिए अच्छा होता है।
19. पीपल वृक्ष में रात में प्रेत का निवास होता है।
अंधविश्वास व्यक्ति को कर्महीन और भाग्यवादी बनाती है। कुछ लोगों के लिए ये आस्था का विषय होते है तो कुछ के लिए मात्र एक परंपरा । भारतीय समाज में ढेरों अंधविश्वास है जिसमें से कुछ धर्म शास्त्रों में उल्लेखित है तो कुछ स्थानीय लोक मान्यताओं पर आधारित है। ऐसा नहीं है कि सभी अंधविश्वास तर्कहीन हो, कुछ लोक विश्वास तत्कालीन तर्क पर आधारित है।
उदाहरण के लिए – नींबू-मिर्च को दरवाजे पर लगाने का एक वैज्ञानिक तर्क भी है कि इनमे साइट्रिक एसिड होता है जो कीड़ों को घर के अंदर आने से रोकता है। मंगल, शनि और गुरुवार को बाल न धोना और पूछा न लगाना जल- बचाव का भी कारक है। रात में पीपल के नीचे सोने से स्वास्थ का नुकसान हो सकता है क्योंकि रात में पीपल बड़ी मात्रा में Co₂ छोड़ता है। उसी प्रकार कुछ अंधविश्वास पूर्णतः तर्कहीन होते है जैसे- बिल्ली का रास्ता पार करने पर ना गुजरना।
वर्तमान समय में वैज्ञानिकता के प्रभाव से इस क्षेत्र में, सुधार अवश्य ही हो रहा है किंतु कहीं-न-कहीं लोक समाज अब भी इन मान्यताओं से ग्रस्त है जिसे शिक्षा और तर्कपूर्ण दृष्टिकोण के माध्यम से बदला जा सकता है।
लोक कथा “परिभाषा और वर्गीकरण” लोक साहित्य के अन्य विषय जैसे लोक गीत, लोक नृत्य, लोक नाट्य, लोकोक्ति, लोक कथा आदि को जैसी परीक्षा केंद्रित ब्लॉग्स पढ़ने के लिए हमारी स्पेशल कैटेगरी ‘लोक साहित्य‘ को देखे। किसी भी प्रकार के सहयोग, प्रश्न अथवा सुझाव के लिए हमारे साथ व्हाट्सएप चैनल के माध्यम से हमसे जुड़े। धन्यवाद!
