Author: Mahima Choudhury

आः धरती कितना देती है सुमित्रानंदन पंत मैने छुटपन में छिपकर पैसे बोये थे सोचा था पैसों के प्यारे पेड़ उगेंगे, रुपयों की कलदार मधुर फसलें खनकेंगी, और, फूल फलकर मै मोटा सेठ बनूगा ! पर बन्जर धरती में एक न अंकुर फूटा, बन्ध्या मिट्टी ने एक भी पैसा उगला । सपने जाने कहां मिटे, कब धूल हो गये। मै हताश हो, बाट जोहता रहा दिनो तक, बाल कल्पना के अपलक पांवड़े बिछाकर । मै अबोध था, मैने गलत बीज बोये थे, ममता को रोपा था, तृष्णा को सींचा था। अर्धशती हहराती निकल गयी है तबसे । कितने…

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वृक्ष रामधारी सिंह ‘दिनकर’ (१) पहली पंक्ति लिखी विधि ने जिस दिन कविता की, उस दिन पहला वृक्ष स्वयं उत्पन्न हो गया। प्रथम काव्य है वृक्ष विश्व के पहले कवि का। (२) दुमों को प्यार करता हूँ। प्रकृति के पुत्र ये bमां पर सभी कुछ छोड़ देते हैं, न अपनी ओर से कुछ भी कभी कहते। प्रकृति जिस भांति रखना चाहती उस भांति ये रहते। भावार्थ:- वृक्ष कविता रामधारी सिंह दिनकर जी द्वारा लिखित कविता है। इस कविता के माध्यम से रामधारी सिंह दिनकर जी ने वृक्षो के महत्व और उनके सरलता तथा त्यागपूर्ण स्वभाव अत्यंत सुंदर और प्रभावी…

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