- धूप का टुकड़ा (सुमित्रा नंदन पंत)
- संध्या सुंदरी (सूर्यकांत त्रिपाठी निराला)
- जागो फिर एक बार २ (सूर्यकांत त्रिपाठी निराला)
- गहन है या अंधकार (सूर्यकांत त्रिपाठी “निराला)
- एक तिनका (अयोध्यासिंह उपाध्याय हरिऔध)
- पानी की प्रार्थना (केदारनाथ सिंह)
- विद्यापति (भक्त कवि या श्रृंगारी कवि)
- गा की वर्षा पावक कण (सुमित्रानंदन पंथ)
Author: Mahima Choudhury
1.अति सूधो सनेह को मारग है…” छंद वर्णन:- अति सूधो सनेह को मारग है जहाँ नेकु सयानप बाँक नहीं। तहाँ साँचे चलें जित आपनपौ झझकैं कपटी जो निसाँक नहीं। घनआनंद प्यारे सुजान सुनौ यहाँ एक ते दूसरों आँक नहीं। तुम कौन धौ पाटी पढ़े हौ कहौ मन लेहु पै देहु छटाँक नहीं ।। १० ।। संदर्भ : आलोच्य अंश रीतिकाल के रीति मुक्त धारा के प्रतिनिधि एवं सर्वश्रेष्ठ कवि हेम की पीर के अमर गायक धनानंद के सुजानहित से उद्धृत है। प्रसंग : उक्त अंश में धनानंद अपनी निष्ठुर प्रेयसी को उपालंभ देते हुए प्रेम मार्ग की सरलता और…
हीन भएँ जल मीन अधीन… हीन भएँ जल मीन अधीन, कहा कछु मो अकुलानि समानै। नीर-सनेही को लाय कलंक निरास है कायर त्यागत प्रानै। प्रीति की रीति सु क्यों समुझे जड़, मीत के पानि परे कों प्रमानै। या तन की जु दसा, घनआनंद जीव की जीवनि जान ही जानै ।। ४ ।। संदर्भ:- प्रस्तुत पद्यांश कवि धनानन्द द्वारा रचित कवित है। प्रसंग:- प्रस्तुत पद्यांश में कान का यह कथन है कि प्रेम की सत्यता वह है जहाँ प्रेमी, प्रिय के वियोग की पीड़ा और वेदना को सहे उससे बचने का मार्ग ना ढूंढे। प्रसंग-व्याख्या:- कवि कहते है कि मछली जल…
लोकोक्तियाँ ⇒ लोकोक्ति दो शब्दों – लोक + उक्ति से मिलकर बना है जिसका आशय है- लोक की उक्ति था कथन । ऐसी उक्ति जो किसी क्षेत्र विशेष में, किसी विशेष प्रसँग में, किसी विशेष अर्थ की ओर संकेत करके उद्धृत किया जाता है, वह लोकोक्ति कहलाता है। उदाहरण के तौर पर जंगल में मोर नाचना किसने देखा (गुण की कद्र गुनवानों के बीच होती है), ‘नाच न जाने आँगन टेढ़ा (काम न आने पर कौशल न होने पर बहाना बनाना), न नौ मनं तेल होगा, न राधा नाचेगी (शर्त पूरी न होने पर, काम का न होना), बिन…
लोक कथा लोक कथा:- ‘लोक’ शब्द का अभिप्राय जन-सामान्य से है जो अभिजात्य संस्कार, शास्त्रीयता और पाण्डित्न की चेतना तथा अहंकार से शून्य है। इन लोक में प्रचलित कलाएँ लोक कला कहलाती है। लोक लोक कथा शब्द मोटे तौर पर लोक प्रचलित उन कथानकों के लिए व्यवहत होता है जो मौखिक-लिखित परंपरा से क्रमश: एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को प्राप्त होते रहें है। डॉ० सत्येन्द्र के अनुसार- “लोक में प्रचलित और परंपरा से चली आ रही मूलतः मौखिक रूप में प्रचलित कहानियाँ लोक कथा कहलाती है।” * लोक कथाओं की परंपरा अत्यंत प्राचीन है। → ऋगवेद में बहुत से…
लोक नाट्य अर्थ और परिभाषा:- ‘लोक नाट्य, दो शब्दों लोक और नाट्य से मिलकर बना है। लोक का आशय उस जनसामान्य वर्ग से है जो अभिजात्य संस्कार, शास्त्रीयता, पाणिटंयू चेतना तथा अहंकार से शून्य है। नाट्य का तात्पर्य है नाटक अर्थात किसी कथानक को अभिनय द्वारा मंचन करना । अतः लोक नाट्य का अर्थ है लोक – कृति को नाट्यरूप में संवाद और अभिनय के माध्यम से किसी कथानक को प्रस्तुत करना। इसे आकर्षक बनाने के लिए नृत्य, संगीत, वेशभूषा आदि का प्रयोग किया जाता है। डॉ० श्रीराम शर्मा के अनुसार- वह नाटक लोक नाट्य कहलाता है जो लोक…
लोक गीत लोक गीत:- ‘लोक’ शब्द का तात्पर्य जन-सामान्य वर्ग से है जो अभिजात्य संस्कार, शास्त्रीयता, पांडित्य की चेतना तथा अहंकार से सून्य है। इसी लोक समाज में विभिन्न अवसरों पर गाए जाने वाले गीत लोकगीत कहलाते है। डॉ० रामनरेश त्रिपाठी ने लोकगीतों को ग्राम्य गीत कहां है। डॉ० सत्येंद्र के अनुसार:- वह गीत जो लोक मानस की अभिव्यक्ति से अथवा जिनमें लोकमानस भाव हो, लोकगीत के अंतगर्त आता है। देवेंद्र सत्यार्थी के अनुसार- ” लोकगीत किसी संस्कृति के मुँह बोले चित्र होते है।” हीरामणि सिंह साथी के अनुसार- लोकगीत जनमानस की कोख से उपजे धरती के गीत हैं जिनमें…
लोक साहित्य ⇒परिभाषा और वर्गीकरण: साहित्य मानव मन की प्रतिछवी है। यह मानव मन के भाव, दशा, सामाजिक स्थितियों तथा विभिन्न परिस्थितियों की सहज अभिव्यक्ति है। साहित्य दो प्रकार के होते है: शिष्ट साहित्य और लोक साहित्य । ‘लोक’ शब्द का अभिप्राय जन-सामान्य से है जो अभिजात्य संस्कार, शास्त्रीयता, पाण्डित्य की चेतना तथा अंहकार से शून्य है। वैदिक साहित्य से लेकर वर्तमान समय तक लोक शब्द का प्रयोग इन्हीं जनसामान्य के लिए हुआ है। अर्थात् लोक साहित्य का तात्पर्य जनसामान्य और ‘Folk Music’समाज के साहित्य से है। वस्तुतः लोक साहित्या अंग्रेजी भाषा के ‘folk Literature’ का हिन्दी अनुवाद है। पाश्चात्…
प्रश्न २) सूरदास के काव्य में संयोग-श्रृंगार का वर्णन कीजिए। उत्तरः सूरदास के काव्य में संयोग-श्रृंगार का वर्णन :- सूरदास कृष्ण भक्तिधारा के सर्वश्रेष्ठ कवियों में माने जाते हैं। ‘सूरसागर’ में उन्होंने राधा-कृष्ण की बाल लीलाओं, प्रेम-व्यवहार, नख-शिख वर्णन तथा संयोग-वियोग की विविध स्थितियों को अत्यंत सुंदरता से प्रस्तुत किया है। उनके काव्य में संयोग-श्रृंगार का वर्णन मधुरता, कोमलता, प्रकृति-सौंदर्य और दिव्य प्रेम से ओत-प्रोत दिखाई देता है। सूरदास का संयोग श्रृंगार केवल लौकिक या शारीरिक प्रेम नहीं, बल्कि आध्यात्मिक अनुभूति का माध्यम बन जाता है, जो उन्हें अन्य श्रृंगार-कवियों से विशेष बनाता है। 1. राधा-कृष्ण के मिलन दृश्यों…
(प्रश्न ) कबीरदास की भक्ति भावना पर आलोकपात। प्रस्तावना : संत कबीरदास भक्तिकाल के निर्गुण काव्यधारा के प्रमुख कवियों में एक है। कबीर पहले एक भक्त बाद में कवि है। उनका व्यक्तित्व बहुआयामी है- कबीर एक संत, ज्ञानातयी कवि, निर्गुण परमात्मा के परम् भक्त, समाज में व्याप्त, विकृतियाँ यथा- जातिवाद, साम्प्रदायिक कट्टरता, दुआइत, बाहयआडम्बरों, धार्मिक पाखण्ड, ब्राहमणवाद, रूढ़िवाद आदि का कठोर विरोध करने वाले समाज सुधारक और बहुतुत रहस्यवादी दार्शनिक है। -भावना को निम्नांकित शीर्षकों के आलोक कबीरदास की भक्ति में देखा जा सकता है – 1. निर्गुण उपासना : कबीर के आराध्य ‘राम’ दशरथ नंदन नहीं है, में आशवादी…
कबीरदास रहस्यवादी कवि & काव्य में संयोग-श्रृंगार का वर्णन प्रश्न:- कबीरदास रहस्यवादी कवि हैं, स्पष्ट कीजिए। उत्तर :- कबीरदास हिंदी साहित्य के अद्वितीय संत-कवि हैं, जिनकी काव्य-दृष्टि में आध्यात्मिक अनुभूति, आत्मा और परमात्मा का एकत्व, ईश्वर-प्रेम तथा आंतरिक साधना की गहराई प्रमुख रूप से दिखाई देती है। कबीर का रहस्यवाद बाहरी कर्मकांडों, पूजा-पद्धतियों और संप्रदायगत सीमाओं से परे जाकर सीधे मानव-हृदय और आत्मा को संबोधित करता है। इसी कारण उन्हें रहस्यवादी कवि कहा जाता है। उनका काव्य मानव-मन को अंतर्मुखी बनाता है और आत्मा को ईश्वर की ओर उन्मुख करता है। 1. आत्मा और परमात्मा के मिलन की अनुभूति:- कबीरदास…
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