- धूप का टुकड़ा (सुमित्रा नंदन पंत)
- संध्या सुंदरी (सूर्यकांत त्रिपाठी निराला)
- जागो फिर एक बार २ (सूर्यकांत त्रिपाठी निराला)
- गहन है या अंधकार (सूर्यकांत त्रिपाठी “निराला)
- एक तिनका (अयोध्यासिंह उपाध्याय हरिऔध)
- पानी की प्रार्थना (केदारनाथ सिंह)
- विद्यापति (भक्त कवि या श्रृंगारी कवि)
- गा की वर्षा पावक कण (सुमित्रानंदन पंथ)
Author: Mahima Choudhury
खद्योत अयोध्यासिंह उपाध्याय हरिऔध प्रकृति-चित्र-पट असित-भूत था छिति पर छाया था तमतोम । भाद्र-मास की अमा-निशा थी जलदजाल पूरित था व्योम। काल-कालिमा-कवलित रवि था कलाहीन था कलित मयंक । परम तिरोहित तारक-चय था, था कज्जलित ककुभ का अंक । 1। दामिनि छिपी निविड़ घन में थी अटल राज्य तम का अवलोक। था निशीथ का समय, अवनितल का निर्वापित था आलोक। ऐसे कुसमय में तम-वारिधि मज्जित भूत निचय का पोत। होता कौन न होता जग में यदि यह तुच्छ कीट खद्योत ।2। ‘खद्योत’ कविता का सारांश:- ‘खद्योत’ कविता में कवि ने घने अंधकार से भरी अमावस की रात का…
भागादेवी का चायघर एस आर हरनोट भागा चाय बेच रही है। उसे नहीं पता कि चाय बेचकर अमेरिका जाया जा सकता है। दुनिया के सबसे शक्तिशाली आदमी से मिला जा सकता है। रूस, चीन, भूटान, ब्राजील, नेपाल और जापान की यात्राएं की जा सकती हैं। म्यामांर, ऑस्ट्रेलिया, साईचीन और मॉरीशस का भ्रमण हो सकता है। श्री लंका, फ्रांस, जर्मनी और कनाडा घूमा जा सकता है। उसे नहीं मालूम चाय बनाते परोसते वह मन की बात भी कर सकती है… जितना चाहे झूठ-सच बोल सकती है। वह इस बात से अनजान है कि चाय बेच कर अच्छे दिन भी आते हैं।…
स्नेह निझिर बह गया है सूर्यकांत त्रिपाठी “निराला” स्नेह-निर्झर बह गया है ! रेत ज्यों तन रह गया है । आम की यह डाल जो सूखी दिखी, कह रही है-“अब यहाँ पिक या शिखी नहीं आते; पंक्ति मैं वह हूँ लिखी नहीं जिसका अर्थ- जीवन दह गया है।” “दिये हैं मैने जगत को फूल-फल, किया है अपनी प्रतिभा से चकित-चल; पर अनश्वर था सकल पल्लवित पल- ठाट जीवन का वही जो ढह गया है ।” अब नहीं आती पुलिन पर प्रियतमा, श्याम तृण पर बैठने को निरुपमा । बह रही है हृदय पर केवल अमा; मै अलक्षित…
ध्वनि सूर्यकांत त्रिपाठी निराला अभी न होगा मेरा अन्त अभी-अभी ही तो आया है मेरे वन में मृदुल वसन्त- अभी न होगा मेरा अन्त हरे-हरे ये पात, डालियाँ, कलियाँ कोमल गात ! मैं ही अपना स्वप्न-मृदुल-कर फेरूँगा निद्रित कलियों पर जगा एक प्रत्यूष मनोहर पुष्प-पुष्प से तन्द्रालस लालसा खींच लूँगा मैं, अपने नवजीवन का अमृत सहर्ष सींच दूँगा मैं, द्वार दिखा दूँगा फिर उनको है मेरे वे जहाँ अनन्त- अभी न होगा मेरा अन्त। मेरे जीवन का यह है जब प्रथम चरण, इसमें कहाँ मृत्यु? है जीवन ही जीवन अभी पड़ा है आगे सारा यौवन स्वर्ण-किरण कल्लोलों पर बहता रे,…
प्रथम रश्मि सुमित्रानंदन पंत प्रथम रश्मि का आना रंगिणि! तूने कैसे पहचाना? कहाँ, कहाँ हे बाल-विहंगिनि ! पाया तूने वह गाना? सोयी थी तू स्वप्न नीड़ में, पंखों के सुख में छिपकर, ऊँघ रहे थे, घूम द्वार पर, प्रहरी-से जुगनू नाना। शशि-किरणों से उतर-उतरकर, भू पर कामरूप नभ-चर, चूम नवल कलियों का मृदु-मुख, सिखा रहे थे मुसकाना। स्नेह-हीन तारों के दीपक, श्वास-शून्य थे तरु के पात, विचर रहे थे स्वप्न अवनि में तम ने था मंडप ताना। कूक उठी सहसा तरु-वासिनि ! गा तू स्वागत का गाना, किसने तुझको अंतर्यामिनि ! बतलाया उसका आना ! “प्रथम रश्मि”…
सखि वे मुझसे कह कर जाते मैथिलीशरण गुप्त सखि वे मुझसे कह कर जाते कह, तो क्या मुझको वे अपनी पथ-बाधा ही पाते? मुझको बहुत उन्होंने माना फिर भी क्या पूरा पहचाना? मैंने मुख्य उसी को जाना जो वे मन में लाते। सखि, वे मुझसे कहकर जाते। स्वयं सुसज्जित करके क्षण में, प्रियतम को, प्राणों के पण में, हमीं भेज देती हैं रण में – क्षात्र-धर्म के नाते सखि, वे मुझसे कहकर जाते। हुआ न यह भी भाग्य अभागा, किसपर विफल गर्व अब जागा? जिसने अपनाया था, त्यागा; रहे स्मरण ही आते ! सखि, वे मुझसे कहकर जाते। नयन उन्हें…
बादल सुमित्रानंदन पंत सुरपति के हम हैं अनुचर, जगत्प्राण के भी सहचर मेघदूत की सजल कल्पना, चातक के चिर जीवनधर मुग्ध शिखी के नृत्य मनोहर, सुभग स्वाति के मुक्ताकर विहग वर्ग के गर्भ विधायक, कृषक बालिका के जलधर ! भूमि गर्भ में छिप विहंग-से, फैला कोमल, रोमिल पंख, हम असंख्य अस्फुट बीजों में, सेते साँस, छुड़ा जड़ पंक ! विपुल कल्पना से त्रिभुवन की विविध रूप धर भर नभ अंक, हम फिर क्रीड़ा कौतुक करते, छा अनंत उर में निःशंक ! सुरपति के हम हैं अनुचर, जगत्प्राण के भी सहचर मेघदूत की सजल कल्पना, चातक के चिर…
सरिता अयोध्यासिंह उपाध्याय हरिऔध किसे खोजने निकल पड़ी हो। जाती हो तुम कहाँ चली। ढली रंगतों में हो किसकी। तुम्हें छल गया कौन छली ।।1।। क्यों दिन-रात अधीर बनी-सी। पड़ी धरा पर रहती हो। दुःसह आतप शीत-वात सब दिनों किस लिये सहती हो।।2।। कभी फैलने लगती हो क्यों। कृश तन कभी दिखाती हो। अंग-भंग कर-कर क्यों आपे से बाहर हो जाती हो ।।3।। कौन भीतरी पीड़ाएँ। लहरें बन ऊपर आती हैं। क्यों टकराती ही फिरती हैं। क्यों काँपती दिखाती है।।4।। बहुत दूर जाना है तुमको पड़े राह में रोड़े हैं। हैं सामने खाइयाँ गहरी। नहीं बखेड़े थोड़े…
प्राकृतिक सौंदर्य श्रीधर पाठक ध्यान लगाकर जो तुम देखो, इस जग की सुघड़ाई को। बात-बात में पाओगे तुम, ईश्वर की चतुराई को ।। ये सब भाँति-भाँति के पक्षी, ये सब रंग-रंग के फूल। यह वन की लहलही लता, नव ललित-ललित शोभा की मूल ।। ये नदियाँ, ये झील सरोवर, कमलों पर भौरों की गूंज। बड़े सुरीले बोलों से ये, गूँज रही बेलों की कुंज ।। ये पर्वत की रम्य शिखाएँ, शोभा-सहित चढ़ाव-उतार। निर्मल जल के झरते झरने, सीमा रहित महा-विस्तार ।। छः प्रकार की ऋतु का आना, नित नवीन शोभा के संग। पाकर समय वनस्पति फलना,…
सुलगती टहनी निर्मल वर्मा कहानी प्रयाग : 1976 मुँह अँधेरे सीटी सुनाई देती है-घनी नींद में सुराख बनाती हुई-एक क्षण पता नहीं चलता, मैं कहाँ हूँ, किस जगह हूँ, कौन-सा समय है? आँखें खुलती हैं, तो ढेस-सा अँधेरा गटगट पीने लगती हैं, जैसे मुँह की प्यास आँखें बुझा रही हैं। याद आता है मेरे नीचे मेरा स्लीपिंग बैग है, मेरी यात्राओं और यातनाओं को ढोता हुआ। मैं जाग गया हूँ-लेकिन मेरी समूची देह गरमाई के घेरे में सो रही है। कुछ देर बाद आँखें अँधेरे में टोहती हुई एक-एक चीज पर ठहर जाती हैं-किताब, तिपाई, लालटेन, फूस का अधखुला दरवाजा,…
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